त्र्यंबक जहां से चलती है गोदावरी

By Tejnews.com Sun, Dec 25th 2016 सैर

हमने मंदिर के सामने ही एक गेस्ट हाउस में संपर्क किया। आसानी से दो कमरे मिल गए। फ्रेश होकर सभी दर्शन के लिए निकल पडे। यहां गर्भगृह में, जो कि भूतल से नीचे है, जाकर दर्शन के लिए विशेष ड्रेस कोड है। हम बाहर से ही दर्शन के लिए कतार में लगे। करीब दो घंटे बाद मंदिर के भीतर प्रवेश मिल सका। दर्शन में एक घंटा और लगा। क्योंकि हॉल में भी भारी भीड थी। अधिकतर लोग ऊपर बने प्लैटफॉर्म से ही दर्शन करते हैं। ज्योतिर्लिंग जमीन में धंसा हुआ है। नीचे बडे आकार का शीशा लगा है। लोग उसी शीशे में ज्योतिर्लिंग के प्रतिबिंब के दर्शन करते हैं।

तीन दशक में हुआ निर्माण

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक यही है, जहां एक साथ तीनों देवों - ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दर्शन होते हैं। कथा है कि एक बार सृष्टि के मूल और उसमें अपनी श्रेष्ठता को लेकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच विवाद हो गया। समाधान न मिलने पर वे भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने एक ज्योति स्तंभ प्रकट किया और उसका स्रोत ढूंढने के लिए कहा। दोनों देव जहां तक जा सकते थे गए, लेकिन कोई ओर-छोर मिला नहीं। अंत में विष्णु जी ने हार स्वीकार ली, पर ब्रह्मा जी ने मूल तलाश लेने का झूठा दावा किया। इससे रुष्ट होकर शिवजी ने ब्रह्मा को शाप दिया कि अब उनकी पूजा नहीं होगी। दूसरी तरफ, शाप से रुष्ट ब्रह्मा ने भी शिवजी को शाप दे दिया, जिससे वह ब्रह्मगिरि पर्वत में समा गए। वही ज्योतिस्तंभ अब ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित है।

ज्योतिर्लिंग पर एक स्वर्णमुकुट भी है। मान्यता है कि यह मुकुट पांडवों के समय से ही है, जिसमें हीरे, पन्ने आदि कई बहुमूल्य रत्न जडे हैं। मंदिर काले पत्थरों का बना हुआ है। यह अपनी विशिष्ट निर्माणशैली के लिए भी जाना जाता है। नागर शैली में बनाए गए मंदिर की बाहरी दीवारों पर कई तरह की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इनमें देवों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों व यक्षों की आकृतियां शामिल हैं। मंदिर का निर्माण कब हुआ, कोई नहीं जानता। वर्तमान मंदिर एक पुनर्निर्माण है, जो श्रीमंत बालाजी बाजीराव पेशवा, जिन्हें नाना साहब पेशवा भी कहते हैं, ने 1755 में शुरू कराया था और पूरे इकतीस वर्षों तक लगातार कार्य के बाद 1786 में संपन्न हुआ। उस समय इसके निर्माण पर सोलह लाख रुपये खर्च हुए थे। मंदिर परिसर में ख्ााली जगह भी ख्ाूब है। वहां दूर-दराज से आए लोग जगह-जगह जुटे हुए थे। कुछ अनुष्ठानों में व्यस्त थे तो कुछ आराम कर रहे थे।

जहां बंधी है गौतमी

दर्शन-पूजन के बाद मंदिर का स्थापत्य देखते-समझते 9 बज गए। बाहर निकल कर नाश्ते के बाद कुशावर्त सरोवर के लिए चल पडे। यह गोदावरी नदी का पहला बडा प्राकट्य स्थल है। इसके पहले यह जहां भी दिखती है, बूंद-बूंद रिसती हुई ही दिखती है। यही ऐसी जगह है जहां गोदावरी का जल पर्याप्त मात्रा में इक_ा दिखता है। ब्रह्मगिरि से यहां तक गोदावरी नटखट बच्ची की तरह लुकाछिपी खेलती आती है। सरोवर के तीन तरफ बना बरामदा देखकर लगता है कि कभी यह वैभव से भरपूर रहा होगा। हालांकि अब रख-रखाव के अभाव में इसकी हालत ख्ाराब हो रही है। सरोवर के चारों कोनों पर छोटे-छोटे चार मंदिर भी हैं। नैऋत्य यानी दक्षिण-पश्चिम कोने पर साक्षी विनायक हैं तो अग्नि अर्थात दक्षिण-पूर्व कोने पर केदारेश्वर, वायव्य यानी उत्तर-पश्चिम में कुशेश्वर महादेव और ईशान यानी उत्तर-पूर्व कोने पर स्वयं गोदावरी का मंदिर है।

ब्रह्मदेव भूलोक पर आए तो उन्होंने शिव की जटा में रहने वाली गंगा की धारा को पृथ्वी पर लाने के लिए भगवान त्रिविक्रम की साधना की। गंगा शिव की जटा छोड पृथ्वी पर आना नहीं चाहती थीं और पार्वती उन्हें किसी तरह शिव से अलग करना चाहती थीं। वह अपनी सखी जया और पुत्र गणेश के साथ गौतम ऋषि के आश्रम आ गईं। इसी बीच लंबे समय तक अकाल पडा। अन्न-जल की कमी से लोग व्याकुल होने लगे। ऋषि गौतम ने तप से वरुणदेव को प्रसन्न कर लिया। उनके आश्रम में प्रतिदिन वर्षा होती। उनका आश्रम त्र्यंबक के निकट था। कई ऋषियों ने भी वहीं आश्रय लिया। इसी समय पार्वती ने अपनी योजना क्रियान्वित की। उनकी सखी जया गाय का रूप धारण कर फसल चरने लगी। उसे भगाने के लिए गौतम ने दर्भ घास फेंककर मारा जिससे गाय की मृत्यु हो गई। उन्हें गोहत्या का पाप लगा। इस पाप से मुक्ति तभी मिल सकती थी जब वह गंगास्नान करते। उन्होंने ब्रह्मगिरि पर तप शुरू किया। उनके तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अपनी जटा को झटक कर गंगा को मुक्त कर दिया। गंगा ब्रह्मगिरि से निकलकर छिपती रहीं, किंतु एक स्थान पर ऋषि गौतम ने उन्हें मंत्रपूरित कुश से बांध दिया और वे वहीं ठहर गईं। वही कुशावर्त सरोवर है। ऋषि यहीं स्नान करके पापमुक्त हुए। गौतम ऋषि के प्रयासों से गोदावरी का अवतरण होने से ही इसे गौतमी के नाम से भी जाना जाता है। इसे दक्षिण की गंगा भी कहा जाता है।

गोदावरी की लुकाछिपी

कुशावर्त सरोवर से हम गोदावरी का उद्गम स्थल देखने चल पडे। कुछ दूर की यात्रा तो सामान्य थी, लेकिन आगे पहाड पर चढऩा था। बच्चों को लेकर मुझे थोडी आशंका थी, जो उनके उत्साह के आगे निर्मूल साबित हुई। एक घंटे की खडी चढाई के बाद हम जहां पहुंचे वह गंगाद्वार था। पुजारी से पूछने पर पता चला कि उद्गम यह नहीं, ब्रह्मगिरि पर है। ब्रह्मगिरि का पता पूछने पर मालूम हुआ कि उसके लिए फिर से नीचे जाना होगा। वहां से करीब तीन किलोमीटर नीचे ही पठारों में बाएं हाथ चलने पर आगे फिर एक खडी चढाई आएगी। उस पर कठिन चढाई के बाद आप ब्रह्मगिरि पहुंच सकते हैं। गंगाद्वार से ही एक रास्ता दाहिने निकल रहा था। पता चला कि यह गोरखनाथ गुफा की ओर जाता है, लेकिन बच्चों के साथ जाने लायक नहीं है। रास्ता ख्ातरनाक है।

अंतत: हम वहां से नीचे उतर कर ब्रह्मगिरि के लिए चल पडे। कडी धूप में सुनसान सा पगडंडियों वाला रास्ता तय करने के बाद एक बार फिर हम खडी चढाई के मुहाने पर खडे थे। न तो धूप से बचने के लिए कहीं पेड या घर थे और न पीने के लिए पानी ही मिलने वाला था। रास्ते भर डराने के लिए शरारती बंदरों का आतंक अलग। दो घंटे के अथक प्रयास के बाद जब हम सह्याद्रि पर्वतशृंखला में मौजूद ब्रह्मगिरि पहुंचे उस समय शाम के पांच बज चुके थे। सभी बेतरह थके हुए थे। लेकिन वहां पहुंच कर ठंडी हवा के झोंके का जो एहसास हुआ उसने फिर से ताजगी भर दी। कुछ रोमांचप्रेमी श्रद्धालुओं के साथ-साथ दो-तीन दुकानें भी दिखीं, जहां खाने-पीने के लिए कुछ मिल सकता था। बहरहाल सबसे पहले गोदावरी के उद्गम स्थल के दर्शन करने थे। भीतर गुफा में गोदावरी का एक छोटा सा मंदिर था। उसके ठीक नीचे गोमुख आकृति का एक निर्माण था, जिससे बूंद-बूंद कर पानी रिस रहा था और सामने ही मौजूद छोटे से कुंड में जमा हो रहा था। मालूम हुआ कि असल उद्गम स्थल तो यह भी नहीं है। वह यहां से लगभग 10 किलोमीटर दूर किसी गांव के पास है, लेकिन उधर जाना बहुत मुश्किल है।

घाटी की मोहक हरियाली

गोदावरी दर्शन के बाद हमने जलपान किया। दाम हालांकि यहां भी हर चीज का बहुत ज्य़ादा था, लेकिन सामान यहां तक लाने में जो श्रम लगा होगा, उसे देखते हुए यह कुछ भी नहीं था। इस पहाडी पर थोडी-थोडी दूरी पर दो-तीन खुली झोपडिय़ां भी थीं। हमने एक झोपडी की शरण ली और थोडी देर विश्राम के बाद पहाड से दूसरी तरफ नीचे मौजूद घाटी का नजारा लेना शुरू किया। यह वाकई शानदार दृश्य था। बंजर से दिखने वाले काले पत्थरों वाले इन पहाडों में नीचे दूर-दूर तक फैली हरियाली मन मोहने वाली थी। इधर पहाड पर जगह-जगह उगे छोटे-बडे पेडों पर नटखट बंदरों का उत्सव देख भरपूर मनोरंजन भी हो रहा था। त्र्यंबक कस्बे की तरफ का नजारा भी इधर से बहुत सुंदर दिख रहा था। इस ऊंचाई से देखने पर त्र्यंबकेश्वर मंदिर का पूरा परिसर तो साफ दिख रहा था, पूरा कस्बा एक छोटी सी यज्ञशाला जैसा लग रहा था। वापस लौटते समय धूप ढल गई थी। छांव हो जाने और ऊपर भरपूर शिकंजी पी चुके होने से उतराई आसान लग रही थी। आठ बजे तक हम वापस गेस्ट हाउस आ चुके थे।

त्र्यंबक कस्बा कभी परंपरागत शिक्षा का बडा गढ रहा है। नाना साहब पेशवा के समय में यहां पांच सौ से अधिक गुरुकुलों के होने का उल्लेख मिलता है। अभी भी कई गुरुकुल हैं। इनमें संस्कृत भाषा, साहित्य, ज्योतिष, कर्मकांड और दर्शन के अलावा अष्टांग योग की भी शिक्षा दी जाती है। भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के का जन्म भी त्र्यंबक में ही हुआ था।

हनुमान जी का जन्मस्थल

दर्शनीय स्थलों में एक अंजनेरी पर्वत अभी बाकी था। अगर हम अंजनेरी पर्वत पर ऊपर जाते तो इसके लिए हमें एक दिन और चाहिए होता, जो संभव नहीं था। सोचा गया कि सुबह नाशिक की ओर वापस चलते हुए रास्ते में ही टैक्सी रोक कर दर्शन कर लिया जाएगा। इसके लिए जरूरी था कि सुबह जल्दी निकला जाए, पर कुछ साथियों ने सुबह फिर त्र्यंबकेश्वर के दर्शन की इच्छा जताई। तय हुआ कि ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ कर जल्दी तैयार हुआ जाए और कतार में लग जाएं। सुबह भीड कम थी। हम सूरज उगने से पहले दर्शन कर चुके थे और इसके बाद नाशिक के लिए रवाना हो गए।

त्र्यंबक कस्बे से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे हनुमान जी का एक नवनिर्मित मंदिर है। अंजनेरी पर्वत यहां से सामने दिखता है। पता चला कि रास्ता सुविधाजनक नहीं है। ख्ौर, अब तो अपने लिए संभव नहीं था। क्योंकि जाने-आने के लिए कम से कम तीन घंटे की जरूरत थी, जो अपने पास नहीं थे। मान्यता है कि यही हनुमान जी का जन्मस्थल है। वैसे हनुमान जी के जन्मस्थल के रूप में कुछ और जगहों का भी जिक्र किया जाता है, पर सारे सांस्कृतिक साक्ष्य जिस जगह को पूरा समर्थन देते हैं वह यही है। ऊपर पहाडी पर जाने पर अंजनी माता का एक मंदिर है। दूसरी तरफ एक सुंदर झील, कुछ झरने और थोडा आगे चलकर एक प्राचीन िकले के अवशेष हैं, जिसे अंजनेरी गढ कहा जाता है। िफलहाल नीचे ही हनुमान जी के दर्शन के बाद, पर्वत के ऊपर के सभी आकर्षणों को फिर कभी के लिए स्थगित कर आगे बढे।

नाक से नासिक नहीं

सुबह 8 बजे हम नाशिक शहर में रामघाट पहुंच गए थे। यह वही जगह है, जहां कुंभ मेले के दौरान जबर्दस्त भीड हुआ करती है। यहां क्लॉक रूम है। नाशिक में हमारा ठहरने का इरादा नहीं था। अत: क्लॉक रूम में सामान जमा कर पंचवटी के लिए निकल पडे। यह वही जगह है जहां भगवान राम वनवास के दौरान सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ ठहरे थे। यहां थोडी-थोडी दूरी पर वट यानी बरगद के पांच पेड हैं। वहीं पास ही कालेराम और थोडी दूरी पर गोरे राम का मंदिर है। थोडी ही दूरी पर सीता गुफा भी है। इसी मार्ग पर आगे चलकर पर्णकुटी है। यही वह जगह है जहां रावण की बहन शूर्पणखा ने सीता जी पर हमला किया था और उन्हें बचाने के लिए लक्ष्मण ने शूर्पणखा पर वाण चलाए, जिससे उसकी नाक कट गई। भ्रांति यह है कि यहां नाक अर्थात नासिका कटे होने के कारण इस शहर का नाम नासिक पडा। वास्तव में 'नासिक रोड केवल रेलवे स्टेशन का नाम है, बाकी पूरे शहर में 'नाशिक लिखा मिलता है। सच यह है कि नाक का शहर के नाम से कोई संबंध नहीं है। इसका वास्तविक नाम है नवशिख, जो अपभ्रंश होकर नाशिक हो गया है। नवशिख नाम इसलिए पडा क्योंकि यह सह्याद्रि पर्वतशृंखला में गोदावरी के तट पर मौजूद नौ शिखरों अर्थात पहाडिय़ों पर बसा हुआ है। ये शिखर हैं - गणेश टेक, दिनगर टेक, मसरुल टेक, जूनी गढी, कोंकणी टेक, जोगवाडा, काजीपुरा, चित्रघंटा और दुर्गावाडी। वैसे भारत के कई शहरों की तरह इसका नाम भी कई बार बदला है। कृतयुग में इसे त्रिकंटक कहते थे तो द्वापर में जनस्थान कहा जाने लगा और कलियुग में यह नवशिख से नाशिक और नासिक भी हो गया। औरंगजेब के शासन काल में कुछ समय के लिए इसका नाम गुलशनाबाद भी रहा। ई.पू. 150 में यह भारत का सबसे बडा बाजार हुआ करता था। आज भी आबादी की दृष्टि से यह महाराष्ट्र का तीसरा और क्षेत्रफल की बात करें तो दूसरा सबसे बडा शहर है।

तपोवन का सुरम्य क्षेत्र

थोडा और आगे बढऩे पर तपोवन है। पुराणों के अनुसार त्रेतायुग में नाशिक दंडकारण्य का हिस्सा रहा है। माना जाता है कि भगवान राम ने अपनी कुटिया यहीं बनाई थी। उन दिनों इस क्षेत्र में कई ऋषि-मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। आज भी कुंभ मेले के दौरान देश के कोने-कोने से आए साधु-संत अपने ठिकाने इसी क्षेत्र में बनाते हैं। गोदावरी में बजबजाते औद्योगिक कचरे की बात छोड दें तो यह बेहद सुंदर जगह है। थोडा चलकर एक छोटी नदी नासर्दी भी गोदावरी में मिल जाती है। दोनों नदियों का कछार और नीचे फूलों के खेत मिलकर जो सुंदर दृश्य बनाते हैं, वह किसी को भी घंटों यहां रमे रहने के लिए मजबूर कर सकते हैं। तेज धूप के बावजूद वहां से हटने का मन नहीं हो रहा था। हालांकि यहां देखने और जानने-समझने के लिए और भी बहुत कुछ है, लेकिन हमें आज ही शिरडी के लिए निकलना था, इसलिए बाकी चीजें कभी और के लिए छोडकर आगे बढऩा पडा।

जरूरी जानकारियां

कैसे पहुंचें

नाशिक के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों से सीधी रेल सेवाएं हैं। वायुमार्ग से जाना चाहें तो मुंबई होकर जा सकते हैं। त्र्यंबकेश्वर नाशिक से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से कभी भी टैक्सी मिल सकती है।

कहां ठहरें

ठहरने के लिए नाशिक और त्र्यंबक दोनों ही जगहों पर भारी संख्या में गेस्ट हाउस और होटल हैं। त्र्यंबक में तो सभी बजट होटल ही हैं, लेकिन नाशिक में आपको लग्जरी सुविधाएं भी मिल सकती हैं।

कब जाएं

वैसे यहां मौसम आम तौर पर खुशगवार रहता है, लेकिन अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे अच्छा होता है।

स्थानीय संपर्क भाषा

अगर आपको मराठी या गुजराती आती हो तो यहां संपर्क करना बहुत आसान होगा, लेकिन हिंदीभाषियों के लिए भी कोई कठिनाई नहीं है। यहां संस्कृत और अंग्रेजी भी बोली-समझी जाती है।

अन्य आकर्षण

अगर आप हाइकिंग या ट्रेकिंग के शौकीन हैं तो आपके लिए यहां हर कदम पर आकर्षण बिखरे पडे हैं। ऐसे लोगों के लिए यहां एक महीने का समय भी कम पड जाएगा। अंगूर के बागान का यह ख्ाास क्षेत्र है। इगतपुरी स्थित बौद्ध मठ धम्मगिरि, नाश

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