फर्स से अर्स तक

By Tejnews.com 2016-02-26 बॉलीवुड     

राज कपूरजी ने 1930 के दशक में बॉम्बे टॉकीज में स्पाट-बॉय और पृथ्वी थिएटर में एक अभिनेता के रूप में काम किया। ये दोनों कंपनियाँ उनके पिता श्री पृथ्वीराज कपूर की थीं। वर्ष 1935 मे दस वर्ष की उम्र में ‘इकलाब’ फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर अभिनय किया। हमारी बात् 1943 गौरी 1943 में छोटी भूमिकाओं में कैमरे के सामने आ चुके थे। राज कपूरजी ने फिल्म वाल्मीकि 1946 नारद और अमर प्रेम् 1948 में कृष्ण की भूमिका निभाई थी। राजकपूर को फिल्म की विभिन्न विधाओं की बेहतरीन समझ थी। यह उनकी फिल्मों के कथानक, कथा प्रवाह, गीत संगीत, फिल्मांकन आदि में स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। इन तमाम गतिविधियों के बावजूद उनके दिल में एक आग सुलग रही थी कि वे स्वयं निर्माता, निर्देशक बनकर अपनी स्वतंत्र फिल्म का निर्माण करे। उनका सपना 24 साल की उम्र में फिल्म आग् 1948 के साथ पूरा हुआ। राज कपूर ने पर्दे पर पहली प्रमुख भूमिका आग् 1948 में निभाई जिसका निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने स्वयं किया था। 24 वर्ष की उम्र में राज कपूर जी के मन में फिल्म स्टूडियो बनाने का ख्याल आया और सन् 1948 में चेम्बूर के बेसकीमती इलाके मे चार एकड़ जमीन लेकर आर.के. स्टूडियो कि स्थापना की। इसके बाद राज कपूर ने एक के बाद एक फिल्मों को इतिहास गढ़ा। 1951 में आवारा् में रूमानी नायक के रूप में ख्याति पाई। राज कपूर ने 1949 ''बरसात'' 1955 ''श्री 420'', 1956 ''जागते रहो'', 1970 ''मेरा नाम'' जैसी सफल फिल्मों का निर्देशन व लेखन किया और उनमें अभिनय भी किया। उन्होंने ऐसी कई फिल्मों का निर्देशन किया जिनमें उनके दो भाई शम्मी कपूरजी व शशि कपूरजी और तीन बेटे रणधीर, ऋषि व राजीव अभिनय कर रहे थे।
राज कपूरजी ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्हें दुनिया के अन्य देशों में भी अपार लोकप्रियता मिली। हिन्दी फिल्मों में राज कपूर को पहला शोमैन माना जाता है क्योंकि उनकी फिल्मों में मौज-मस्ती, प्रेम, हिंसा से लेकर अध्यात्म और समाजवाद तक सब कुछ मौजूद रहता था और उनकी फिल्में एवं गीत आज तक भारतीय ही नहीं तमाम विदेशी सिने प्रेमियों की पसंदीदा सूची में काफी ऊपर बने रहते हैं। राज कपूरजी हिन्दी सिनेमा के महानतम शोमैन थे, जिन्होंने कई बार सामान्य कहानी पर इतनी भव्यता से फिल्में बनाईं कि दर्शक बार-बार देखकर भी नहीं संतुष्ट होते है। राज कपूरजी की आवारा, श्री 420, जिस देश में गंगा बहती है आदि फिल्मों में समाजवादी सोच विशेष रूप से उभर कर सामने आती है। राज कपूरजी नें जगप्रसिद्ध कलाकार चार्ली चैप्लिन की अभिनय शैली को बालीवुड मे स्थापित किया। राज कपूरजी में हमें महान अभिनेता चार्ली चैपलिन की झलक दिखायी देती है। उन्होंने चैपलिन को भारतीय जामा पहनाया जो बेहद लोकप्रिय और आकर्षक था जिसने देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी धाक मनवाई। यद्यपि उन्होंने अपनी आरंभिक फिल्मों में रूमानी भूमिकाए, निभाई। लेकिन उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध चरित्र चार्ली चैपलिन् का गरीब लेकिन ईमानदार आवारा् का प्रतिरूप है। उनका यौन बिंबों का प्रयोग अक्सर परंपरागत रूप से सख्त भारतीय फिल्म मानकों को चुनौती देता था। राज कपूरजी नें महान अभिनेता चार्ली चैपलिन का भारतीयकरण शुरू किया और श्री 420 में यह नए मुकाम पर पहुँचता दिखता है। सोवियत रूस में उनके दीवानों की बड़ी संख्या थी। उन्हें 1986 मे प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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