व्हाइट टाइगर का जनक मोहन

By Tejnews.com 2016-11-10 सैर     

दुनियॉ मे व्हाइट टाइगर के लिये मशहूर रीवा मे एक भी नही बचे, सफेद बॉघ जबकि रीवा मे जन्मे सफेद बॉघ के वंशज पूरी दुनियॉ मे चर्चित है। हैरत है जगह की पहचान व्हाइट टाइगर के लिये होती है वह बॉघ आने की बॉट-जोह रहा है।
दुनिया मे पाये जाने वाले बॉघ से अलग.. सफेद बॉघ 9 फिट लम्बा, सफेद रंग, गुलाबी नाक, लम्बा जबडा, नुकीले दॉत। यही है सफेद बॉघो का जनक मोहन, मोहन की कहानी रीवा से शुरु होती है जो पूरी दुनियॉ मे मशहूर है। 1951 में सीधी के बगरी जंगल से महाराजा मार्तण्ड सिंह ने शिकार के दौरान 6 माह के शावक को पकडा और इसका नाम रखा मोहन। इस बॉघ को पकडकर गोविन्दगढ किला लाया गया और इसे यहॉ रखने के लिये बॉघ महल बनाया गया। नन्हे मोहन को महल मे रखने के पुख्ता इंतजाम थे।
गोविन्दगढ बॉघ महल मे नन्हा मोहन अकेलापन होने के चलते उदास रहता था, कभी सोज विचार के बाद महाराज ने बाघिन भी महल मे रखने का निर्णय लिया। मोहन और बेगम को महल मे छोड दिया गया इसके बाद मोहन ने जंगल की तरफ मोड कर नही देखा। मोहन की चर्चा देश-विदेशो मे फैल गयी और एक-एक करके सफेद बॉघ पूरी दुनियॉ मे पहुंच गये।
प्रतिदिन 10 किलो बकरे का गोस्त, दूध, अंडे मोहन का प्रिय आहार था। लेकिन आश्चर्य यह था कि मोहन रविवार के दिन व्रत रखता था और फुटवाल उसका पसंदीदा खेल था। मोहन की अठखेलियॉ देखने के लिये दूर-दूर से सैलानी आते थे और बॉघ महल की बॉघो के देखने के लिये सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये थे।
तीन रानियॉ चौतीस सन्तानें.. जी हॉ रीवा की जमी पर मोहन की तीन रानियॉ बॉघ महल गोविन्दगढ मे थी और इनसे 34 सफेद बॉघ जन्में। जो आज पूरी दुनियॉ मे आकर्षण का केन्द्र है।
16 वर्षीय सफेद बॉघ मोहन की राधा, सुकेशी नाम की तीन रानियॉ थी, बेगम ने 14, राधा 7 और सुकेशी ने 13 सफेद बॉघो को जन्मा। 1955 में पहली बार बॉघो के बेचने और क्रय करने की घटना हुई। कोलकत्ता के पी.एम.दास है 2 बॉघ और बाघिन को क्रय किया। इसके पूर्व बॉघो के चमडो की बिक्री होती थी यह नई घटना थी इसलिये चर्चा का विषय बन गयी। बॉघ देखने के लिये राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरु रीवा आये। इन्हे यहॉ महाराज ने एक-एक बॉघ भेंट किये। इसके बाद देश-विदेशो मे बॉघ भेजने का दौर शुरु हो गया। गोविन्दगढ बॉघ महल मे मोहन का वंशज विराट आखिरी बॉघ था। इसकी मौत के बाद महाराज के बॉघो से मोह भंग हो गया, बॉघो को यहा से बाहर भेज दिया गया।
बॉघो को गोविन्दगढ लाने के ढेरो प्रयाश किये गये लेकिन सब बेकार। यहॉ आने वाले सैलानी सफेद बॉघ का नाम सुनकर रीवा जरुर आते है लेकिन इन्हे मायूस होना पडता है।
जीवित बॉघो की ताबडतोड खरीदी-बिक्री तो रीवा रियासत मे हुई ही.. मरने वाले सफेद बॉघो को भी लकडी की चौखट मे जडवाकर ब्रिटेन की समाग्री महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। यह किंग्सटन प्राकृतिक संग्रहालय में सुरक्षित रखा हुआ है। भले ही मोहन खामोस हो गया हो लेकिन इसके वंशजो की दहाड देश विदेश मे गूंजती है।
व्हाइट टाइगर बेव दुनियॉ का भी बादशाह है सफेद बॉघो पर एकदो नही लाख के भी अधिक बेवसाइड बनी हुई है साथ ही विदेशो मे आय का जरिया भी सफेद बॉघ है।
दुनियॉभर मे सबसे अधिक बेवसाइडें व्हाइट टाइगर पर बनी हुई है टाइगर की भले ही पहचान रीवा मे ना हो लेकिन इंटरनेट पर देखने से पता चलता है कि व्हाइट टाइगर देखने की कितने ज्यादा लोगो को दिलचश्पी है। व्हाइट टाइगर के नाम पर पैटिंग से लेकर प्रचार प्रसार की साइडे बनी हुई है। कई कम्पनियॉ भी व्हाइट टाइगर सेम्बल का इस्तेमाल प्रोडेक्ट पैकेज को प्रमोट करने के लिये कर रही है। इस तरह से 19 लाख से भी अधिक साइडें व्हाइट टाइगर के नाम पर बनी हुई है, यह अपने आप में रिकार्ड है।
कसीनो के लिये मसहूर अमेरिका का लासवेगास शहर यहॉ एक ही जगह पर हिन्दुस्तान मे मौजूद कुल बॉघो से भी अधिक सफेद बॉघ है। यहॉ पर हर रोज बॉघो का सो होता है और एक ही दिन मे करोडो रुपये की आय मिलती है।
व्हाइट टाइगर ना केबल बेव दुनियॉ का सरताज है बल्कि आय का कमाने का जरिया। लेकिन सफेद बॉघ की जन्म स्थली में बॉघो से आय कमाने के बारे मे सरकार ध्यान ही नही दे रही है। हजारो सैलानी सफेद बॉघ तो देखने आते है लेकिन इन्हे महज ट्राफी देखने को मिलती है।
सफेद बॉघो की जन्म स्थली मे बॉघ वापस लेने के प्रयास किये तो लम्बे अर्से से किये जा रहे है लेकिन नतीजा सिफर है। दुनियॉ का सरताज है सफेद बॉघ गोविन्दगढ लौटने के इंतजार मे वाटजोह रहा है।
रीवा रियासत के वारिस महाराजा पुष्पराज सिह ने गोविन्दगढ मे बॉघ की वापसी के लिये अथक प्रयास किये। लेकिन परिणाम शून्य रहा, महज बॉघ लाने का प्रस्ताव कागजो तक ही सिमट कर रह गया। राजनेताओ और पर्यटन विभाग फैसला ही नही कर पाया कि रीवा मे सफेद बॉघ की वापसी हो।
स्थानीय विधायक के वन मंत्री होने से विंध्य वासियो की उम्मीदे बढ गयी है, वन विभाग बॉघ की वापसी के लिये योजना तो बना रहा है लेकिन यह योजना पूरी हो पायेगी यह कहना मुश्किल है। विभाग जिस स्थान का चयन सफेद बॉघ लाने के लिये किया जा रहा है वह चारो तरफ से खुला जंगल है यहॉ बॉघ को रखना चुनौती पूर्ण होगा।
भले ही वन मंत्री मुकुन्दपुर के जंगल मे बॉघ छोडने के दावे करे लेकिन यह आसान नही है। सफेद बॉघ की वापसी के लिये पहले जंगल मे जगह बनाना बॉघ की देखरेख करना और बॉघ से लोगो को बचा पाना नामुमकिन दिखता है।
सफेद बॉघ देखने की ललक मे सात समंदर पार से सैलानी रीवा और फिर गोविन्दगढ तक पहुंचते है लेकिन इन्हे महज जर्जर बॉघ महल देखने को और बॉघो की कहानियॉ सुनने को मिलती है।
ये है गोविन्दगढ का बॉघ महल.. ईमारत भले ही जर्जर हो गयी हो लेकिन इसी जगह सफेद बॉघो ने इतिहास रचा। जंगल से मोहन को पकड कर.. इस महल मे रखा गया। यहॉ बॉघो की परवरिश होती और हर रोज हजारो दर्शक बॉघो को इस जगह देखने आते थे। वर्तमान मे भी इसी ख्वाईस से सैलानी दौडे आते है लेकिन यहॉ इनकी उम्मीद पर पानी फिर जाता है।
कैमोर की पहाडियो से लगा हुआ विशाल सरोवर और भव्य राघव महल रीवा रियासत के राजा-महाराजाओ के वैभव की कहानी कहता है। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यह खंडहर मे तबदील होता जा रहा है। वक्त ने भले ही मोहन को खामोस कर दिया हो बावजूद इसके व्हाइट टाइगर मोहन के वंशजो की दहाड दुनियॉ भर मे गूंजती है।

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