पेशवा वंशज की 10 हजार सेना के बाद भी 200 राजपूतों ने यशवंत राव का कलम कर दिया था सर

By Tejnews.com 2021-10-10 द बघेली     

पेशवा वंशज की 10 हजार सेना के बाद भी 200 राजपूतों ने यशवंत राव का कलम कर दिया था सर, बहुचर्चित नैकहाई युद्ध में कलचुरि और परिहार राजपूतों ने दिलाई थी जीत..

वीरों की पावन जन्मभूमि रीवा में नैकहाई युद्ध् बहुचर्चित है। इस राज्य के वीररत्नों ने जो त्याग और पोरूष दिखाया है उसका इतिहास अमर है। तीन सदियाँ बीत जाने के बाद भी नैकहाई युद्ध की चर्चा आज भी होती है। इस युद्ध को लेकर कई तरह की किंबदंतियों है। नैकहाई युद्ध राज्य विस्तारवादी तत्कालीन बाँदा नवाब अलीबहादुर के सिपहसालार नायक यशवंत राव निम्बालकर के विरुद्ध रीवा राज्य के चंद सरदारों ने लडा था। इसमें रायपुर कर्चुुलियान के कलचुरि और परिहार राजपूतों की संयुक्त वीर वाहिनी ने अहम भूमिका निभाई थी। इनके अलावा तेंदुन के बघेल, गहरवार, ब्राम्हण, बरगाही बारी और मुश्लिम योद्धा प्रमुख थे। इस युद्ध के पीछे दो प्रमुख कारण थे। विन्ध्य का एक बडा भू-भाग बघेल रियासत रीवा राज्य में था। महाराज विक्रमादित्य के अवसान के बाद सन 1624 में इनके सुपुत्र महाराज अमर सिंह ने राज्य की बागडोर सम्हाली। इन्हे भारत के तत्कालीन बादशाह शाहजहाँ से पंचहजारी मनसब प्राप्त की। महाराज अजीत सिंह ने शाह आलम को प्रश्रय दिया और मुकुन्दपुर की गढ़ी में बहुत आदर और सम्मान के साथ रखा था।
रीवा राज्य को हडपने के लिए पेशवाओं का वंशज यशवंत राव निम्बालकर 10 हजार की सेनिक लेकर राज्य में चढाई कर दी। नायक नाम से भी प्रसिद्ध निम्बालकर अपनी सेना के साथ चन्दुआ नाला के मैदान तक पहुंच गये थे। यह खबर मिलते ही महाराज अतीज ंिसह बहुत घबराये और चैथ देकर संधि करना ही उन्होने उचित समझा। इससे उनकी सेना में कोई उत्साह न रह गया था। यह सुनते ही चन्देलिन रानी कुन्दन कुॅवरि क्रोधित हो गई। उन्होने राज्य के सरदारों को बुलाया, महारानी नें उपस्थित सरदारों को दासी से पान के बीडे भिजवाये और कहला भेजा पान का बीड़ा वही उठा सकता है जिसकी नसों में वीर क्षत्रिय का रक्त बहता हो और जो अपने देश की प्रतिष्ठा के लिए आत्म बलिदान कर सकता हो। शत्रु सिर पर है राज्य खतरे में है। महाराज का अपमानजनक संधि-प्रस्ताव मुझे स्वीकार नही है। जो शत्रु से मोर्चा लेने को तैयार नही है उनके लिए मैं लहॅगा चुनरी और चूडियां भेज रही हूं। वह पहनकर बैठे और मैं शत्रु से भिडूंगी। महारानी की ललकार सुनते ही सरदारों के खून में उबाल आ गया।
युद्ध का डंका बज गया। बडे प्रयास के बाद 200 सैनिक इक्कठा हो पाये थे। इन सब को दो दलों में बांटा गया। एक के नायक थे गजरूप सिंह बघेल और दूसरे का कलंदर साह कलचुरि। युद्ध की रणनीति तैयार करने के बाद बघेल सेना बीहर नदी घोघर घाट और कलचुरि सेना गोड़टुटा घाट निपनिया की तरफ से उतरे। नायक के पडाव से दूर अरहल और बडी-बडी जोनरी के खेत थे। फिर क्या जाल बनाने के लिए तीन-चार पेडों को आपस में बांध दिया गया। ताकि इससे गुजरने वाले फंस जाये। इसके बाद कलचुरी और बघेल योद्धाओं ने हमला कर दिया। नायक की नागा सेना के नायक कर्नल मीसलबैक मैदान तक पहुंचे नही थे। पठान सेना को लामबंदी का हुक्म नही था। यशवंत राव हांथी पर चढ कर यहां के राजपूतों की लडाई और लडने का ढंग देख रहे थे। उन्हे अपनी विशाल सेना पर अतिविश्वास और घमंड था। हांथी में सवार नायक आपने सामने का युद्ध लडने के लिए हांथी से उतर कर घोडे में सवार होने लगा उसी बीच एक भाला छाती और बरछी कलेजा चीर कर बाहर निकल गई। नायक जमीन मे गिर गये इतने में एक योद्धा ने सिर को गर्दन से अलग कर दिया और लेकर किला पहुंच गये। वीर कलचुरि और बघेल योद्धाओं ने मिलकर शत्रु की विशाल सेना को विध्वंस कर डाला। पक्ष-विपक्ष के सैकड़ों हताहत योद्धाओं के साथ ही नायक भी मारा गया और राज्य पराधीन होने से बच गया। यही घटना नैकहाई युद्ध के नाम से बहुचर्चित हुई। इस युद्ध में सबसे अधिक सराहना कलचुरि योद्धाओं की हुई।
इसमें श्याम साह कलचुरि पटना, बहादुर सिंह कलचुरि, मान सिंह कलचुरि, उम्मेद सिंह कलचुरि रायपुर, सिउदत्त सिंह कलचुरि, सीताराम सिंह परिहार, पहार सिंह परिहार वती सिजहटा, मरजाद सिंह परिहार, रतन सिंह कलचुरि डिहिया, वीर सिंह कलचुरि, प्रथपाल सिंह कलचुरि डिहिया, सिउजरा सिंह बघेल मनकरी, गजरूप सिंह बघेल तेंदुन, सिउदत्त सिंह बघेल तेंदून, गोपाल सिंह बघेल, गनेस सिंह बघेल, जालिम सिंह बघेल बेलवा सिरमौर, जगमोहन सिंह बघेल फूल, पृथ्वी सिंह बघेल हटवा, बख्ताबर सिंह बघेल रामपुर, अनूप सिंह बघेल, खुमान सिंह बघेल, गजराज सिंह बघेल गढवार, निपुनाथ सिंह बघेल महसुआ, पंचम सिंह बघेल, आधार सिंह बघेल, हनुमान सिंह बघेल खन्नौधी, कल्यान सिंह बघेल इटहा, अमर सिंह बघेल कॅधवार, उमराव सिंह बघेल, सिउराज सिंह बघेल सरिया, देवी सिंह चॅदेल सिलपरा, सिरनेत सिंह रैकवार नादन टोला, सिरनेत सिंह गहरवार पटना, पंचम सिंह बरगाही रीवा, बग्गा खां साहनी बिछिया, रामकस बारी रीवा, सरूराम ब्राम्हण, समई लाल ब्राम्हण, पंचम सिंह पमार कोकाघाट, सुरपत सिंह पवार, लाल गोपाल सिंह तेंदुन, अनूप सिंह बघेल रामपुर, गोपाल सिंह बघेल तेंदुन, श्यामसाय कलचुरि पटना, पहार सिंह परिहार सिजहटा, नायक, धउआ बरगाही मारे गये थे। बाबूपुर चोरहटा में कुछ स्मारक मौजूद है।

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