बघेल रियासत के पहले और आखिरी राजा थे महाराज अमर सिंह जिन्हे प्राप्त थी बादशाह शाहजहाँ से पंचहजारी मनसब..

By Tejnews.com 2021-10-10 द बघेली     

विन्ध्य का एक बडा भू-भाग बघेल रियासत रीवा राज्य में था। महाराज विक्रमादित्य दिल्ली सम्राट जहाँगीर के समकालीन थे। महाराज विक्रमादित्य के आने से पूर्व सन् 1554 में यहाँ एक बस्ती का निर्माण शेरशाह सूरी के पुत्र जलाल खाँ (सलीमशाह) के द्वारा कराया गया था। अपने पिता की मृत्यु का समाचार पाकर जलाल खाँ यहीं से कालिंजर गया था और उसके पश्चात् सलीमशाह के नाम से दिल्ली के सिंघासन पर बैठा था। जलाल खाँ ने यहाँ पड़ाव के दौरान बीहर-बिछिया के संगम स्थल के किनारे किले की नींव डाली थीं। महाराज विक्रमादित्य के अवसान के बाद सन 1624 में इनके सुपुत्र महाराज अमर सिंह ने राज्य की बागडोर सम्हाली। इन्हे भारत के तत्कालीन बादशाह शाहजहाँ से पंचहजारी मनसब प्राप्त की।
एक यही पहले और आखिरी बघेल राजा रहे जिन्होने मुगलिया मनसब के साथ दो बार शाही अभियान में शामिल हुये थे। ये दोनो युद्ध ओरछा के बुँदेला राजा के विरुद्ध लड़े गए थे। इसका खामियाजा इनके वारिस राजा अनूप सिंह को भुगतना पड़ा जिन्होने सन 1640 में रीवा राज्य की सत्ता सम्हाली थी। इन्हे भी एक हजारी मनसब प्राप्त हुआ था जिसका उपभोग ये न कर सके। मुगलिया सेना के फौजी ओहदेदार मनसबदार कहलाते थे। एक हजारी, दो हजारी, तीन हजारी मनसबदारी हुआ करती थी। ऐसे ही चार, पाँच और इसके आगे की संख्या की भी। इसके लिए निर्धारित संख्या में मनसबदार को हाथी, ऊँट, घोडे और सैनिक रखने पड़ते थे। जिसके लिए मनसबदार को तनख्वाह निर्धारित हुआ करती थी, ताकि इन सबका रख रखाव हो सके।
अमर सिंह का जन्म सन् 1583 में हुआ था। महाराज विक्रमादित्य के पश्चात् उनके पुत्र अमर सिंह सन् 1624 में राजगद्दी पर बैठे। दिल्ली के बादशाह जहाँगीर से इनके अच्छे संबंध थे। सन् 1626 में महाराज अमर सिंह ने मुगल सेना का साथ देते हुए ओरछा के बागी राजा जुझारू सिंह बुन्देला के साथ युद्ध किया था। सन् 1633 के आसपास महाराज अमर सिंह ने अमरपाटन की गढ़ी का निर्माण कराया था तथा एक तालाब खुदवाया था। इस स्थान का नाम अमरपाटन इसी समय पड़ा। महाराज अमर सिंह साहित्य प्रेमी थे। इनके दरबार में रहकर कवि नीलकण्ठ ने ‘‘अमररेश विलास’’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी। घनश्यामदास के पुत्र भूपति राय इनके दरबारी कवि थे। महाराज अमर सिंह सन् 1624-1640 रीवा रियासत के नरेश रहे उनका स्वर्गवास सन् 1640 में हुआ।
महाराज अमर सिंह के स्वर्गवास के समय युवराज अनूप सिंह की उम्र 16 वर्ष की थी। किशोरावस्था में ही इनके ऊपर राज्य सत्ता का भार आ गया। राज्य की इस स्थिति को देखकर सन् 1650 में ओरछा के राजा जुझारू सिंह के भाई पहार सिंह बुन्देला ने रीवा पर आक्रमण कर दिया। उस समय महाराज अनूप सिंह बान्धवगढ़ की ओर चले गये थे। पहार सिंह के आक्रमण का मुकाबला कसौटा के वीर जगत राय तथा लाल फतेह सिंह के नेतृत्व में रीवा की फौज ने किया। रीवा की फौज विजयी हुई। कुछ दिनों बाद महाराज अनूप सिंह रीवा आये। इसी समय लाल फतेह सिंह ने सोहावल की रियासत कायम की। दिल्ली के सम्राट शाहजहाँ से महाराज अनूप सिंह ने सन् 1655-56 में भेंट की थी। दिल्ली सम्राट ने इनका सम्मान करते हुए इन्हें ‘‘सेह-हुजूरी’’ की उपाधि से नवाजा था। अनूप सिंह ने रीवा राज्य के दक्षिणी क्षेत्र में अपने नाम से अनूपपुर कस्बा (वर्तमान समय में जिला) आबाद किया था।
ओरछा के बुँदेला राजा जो पहले मुगलिया सलतनत के दुश्मन हुआ करते थे वज उसके आधीन हो गये थे। राजा पहार सिंह बुँदेला को चैरागढ़ के बागी गोंड़ राजा हिरदे साहि को सबक सिखाने के लिए बादशाह ने भेजा। हिरदे साहि सपरिवार रीवा भाग आये और महाराज अनूप सिंह ने पनाह दी। पहार सिंह को अपने पूर्वज और बघेल राजा के वारिस से बदला लेने का मौका मिला। महाराज अनूप सिंह अपने परिवार और राजा हिरदे साहि के परिवार के साथ रीवा की अपनी गढ़ी छोड़ कर जा त्योंथर के बनाँचल में थे। पहार सिंह ने रीवा आकर मनपसार लूट मचाई और हांथी घोडे़ ऊँट लूट ले गये। राज्य का काफी बड़ा भूभाग भी हड़प लिया था। बाद में लूटे हुये दो हाथी और तीन हथिनियों मे से एक हाथी और दो हथिनियाँ बादशाह को नजर कर दीं। राजा अनूप सिंह का आमेर के मिर्जा राजा जय सिंह की सिफारिस से बादशाह ने गुनाह माफ कर दिया। इन्हे पुनः सन 1656 में रीवा राज्य वापस मिला पर काफी बड़े भूभाग से हाथ धोना पड़ा। अनूप सिंह को सन 1657 में तीन हजारी मनसब तो मिला, किन्तु इन्हे भी सेना गठन की नहीं सूझी।

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