विंध्य क्षेत्र में मौजूद है शैलचित्रों का अदभुत संसार:

By Tejnews.com 2021-10-10 रीवा रीजन     

विंध्य क्षेत्र का भारत के इतिहास मे एक विशिष्टि स्थान है। विंध्य को मानव के अदिृतीय एवं प्रथम कीडास्थली होने का गौरव प्राप्त है। मानव के विकास की सभी अवधारणाएं यहां क्रमबद्ध रूप में उपस्थित है। यही वजह है कि विंध्य की भूमि स्वयं मे मानव शैल चित्र का अपना एक संसार सा समेटे हुये है। विंध्य की प्राकृतिक गुफाओं एवं इन गुफाओं मे उपस्थित शैलचित्रों ने संस्कृती के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सोहागी की पहाडी हो या कैमोर पर्वत श्रृखला शैलचित्रों को हम सहज ही देख सकते है।
सोहागी के पहाड मे पाये गये शैलचित्रों को भारत के प्रथम शैल चित्रों का गौरव प्राप्त है। यही वजह है जहां उन्नीसवी शताब्दी के अठवें दशक में सर्वप्रथम शैलचित्रों के अध्ययन का कार्य प्रारभ्भ हुआ था। तब से लगातार अनेक इतिहास कार एवं कला प्रेमियों के साथ पुराविदों द्वारा इसके महत्व को उद्रघटित करने का प्रयास जारी है। विंध्य से गुजरने वाली पर्वत माला कैमूर श्रंखला के नाम से जानी जाती है। कैमूर पर्वत माला में शैलाक्षय, गुफाये एवं छतनुमा मोड प्रमुखता से जलप्रवाह एवं प्राकृति के कारण निर्मित हुये है जहां मानव जीवन की सर्वाधिक संभावनाएं थी। साथ ही मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें जैसे जल भोजन एवं उपकरणों के निर्माण के माध्यम सुलभ थे। इन शैलाक्षयों का उपयोग मानव नें अपने रहवास के लिये किया और इन्ही गुफाओ मे अपना ठिकाना बनाया।
विंध्य क्षेत्र मे प्रमुख रूप से तीन प्रकार के शैलाक्षय पाये गये है। पहले वे जिनका उपयोग मानव द्वारा स्वयं के रहवास के रूप मे किया गया था और वे चित्रित है। दूसरे वे है जहां मानव के आवास के रूप मे उपयोग तो किया गया वहां शैलचित्र का किसी भी तरह का कोई निशान नजर नही आता। ये स्थल पूर्णतया चित्र है और तीसरे स्थल वे है जिनमें आवासियों ने चित्रण हेतु विशेष रूचि ली और यहां शैल चित्रों की एक लम्बी श्रंखला देखी जा सकती है। अनेक ऐसे स्थल भी ज्ञात हुये है जहां पर बैठने मात्र का भी स्थान नही है वहां केवल लेटकर ही चित्रकारी की जा सकती है। इस प्रकार के स्थलो मे गड्डी पहाड, मैसोर, लोखहिया, धारकुडी शैलाश्रय समूहों का उल्लेख किया जा सकता है। आज वर्तमान समय मे आवागमन एवं अन्य सुविधाएं इतनी अत्याधिक विकसित होने के बाद भी इन दुर्गम स्थल पर पहुंचना कठिन है।
विंध्य क्षेत्र मे मिलने वाले शैलाश्रय समूह का नामकरण उनके प्राप्त स्थल के आधार पर किया गया है। जिनमें प्रमुख है हनुमना समूह मैसोर, लखहिया, लेख्तवेदिया (30 शैलाश्रय) गड्डी समूह (10 चित्रित शैलाश्रय) बदवार समूह (5 चित्रित शैलाश्रय) जल्दर समूह (5 चित्रित शैलाश्रय) सोहागी समूह (6 चित्रित) बैकुठपुर (4 चित्रित शैलाश्रय) चैसडा समूह (16 चित्रित शैलाश्रय) शिवपुरवा समूह (3 चित्रित शैलाश्रय) खन्दो समूह 8 चित्रित शैलाश्रय। इनके अतिरिक्त केवेटी, देउर कोठार, लेदरीे घाट, धारकुडी, जलापा, डूडी गढी आदि स्थानो पर भी शैलाश्रय प्राप्त हुये है। विंध्य क्षेत्र में शैल चित्रकला का आरम्भ उस समय से हुआ जब से यहां के मानव आखेट तथा खाद्य संग्रहण करने लगे थे। उसके द्वारा निर्मित किये गये चित्रों मे मुख्यतः मनुष्य द्वारा पशुओ का आखेट तथा विभिन्न शस्त्रों का प्रयोग व भोजन के लिएा प्रयुक्त होने वाले पशुओ की बहुलता है। विंध्य क्षेत्र मे प्राप्त हुये शैल चित्रों मे मुख्य रूप से हिरण, भैसा, बैल, हांथी सुअर बारहसिंगा, बंदर, सांप तथा पक्षियो की आकृतियां प्रमुख है।
शैलाचित्रों के निर्माण मे विशेष रूप से खनिज रंगों का प्रयोग किया गया है। जिनमें लाल गेरू, रक्ताम, पीला, एवं सफेद रंग प्रमुख है। इन लाल गेरूए, पीले आदि रंगो से निर्मित होने के कारण ये चित्र गुफाओ मे स्पष्ट रूप से दिखाई देते है। यहां के शैल चित्रों का तिथिक्रम उनकी विषय वस्तु चित्रण शैली, रंग, अध्यारोपण, तथा अन्य संबंधित सामग्री के आधार पर तुलनात्मक अध्यनोपरांत विकासात्मक रूप से 12000 वर्ष ईसा पूर्व से 1600 ईसा पूर्व के अन्तर्गत रखा जा सकता है। इन शैलचित्रों के माध्यम से मानव जीवन की विभिन्न अवस्थाओ का कम्रबद्ध रूप से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। विंध्य क्षेत्र मे प्राप्त हुये शैलाचित्रों का भारतीय शैलचित्र के इतिहास मे एक महत्व पूर्ण स्थान है।

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