भरहुत चित्रकला, मूर्तिकला संग्रहालय में है प्रदर्शित हो रही है आर्य, बौद्ध आदिवासी कला संस्कृति:

By Tejnews.com 2021-10-10 रीवा रीजन     

अगर आपको सैकडों वर्ष पुरानी कला संकृति के बारे में जिसे आपने सुना है उस कला संस्कृति से रूबरू होना चाहते है तो एक बार वेद वाणी वितान, प्राच्य विद्या शोध संस्थान सतना का भ्रमण जरूर करियेगा। यहां सैकडों वर्षो की कला संस्कृति को सजो का रखा गया है।
धर्म दर्शन के प्रख्यात विद्वान, इतिहासविद, राष्ट्रपति सम्मानित डाॅ सुद्युम्न आचार्य के अथक प्रयासों से यह संभव हो सका है। इसमें विन्ध्य इतिहास, कला, संस्कृति प्राचीन तथा मध्य युग से संबंधित घटनाओं के भाव-चित्र, भरहुत स्तूप के सैकडों फोटो-चित्र, ड्रांइग, पेंटिंग, फोटो एलबम फ्रेम्ड चित्र, वृत्चित्र भरहुत घडी तथा आधुनिक कलाकारों द्वारा निर्मित विशालकाय अनुकृतियां का मनोहारी प्रदर्शन मौजूद है।
सतना का प्राचीनतम अभिलिखित दस्तावेज- भरहुत के तोरण द्वारा पर एक विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेख अंकित है। इसे यहां प्राचीन ब्राम्हीलिपि तथा 4 भाषाओं में प्रस्तुत किया गया है।
ऐतिहासिक घटनायें- मगधनरेश अजात शत्रु ने भगवान बुद्ध के चरणों की वंदना की थी। वे अपने प्रसाद से हांथी पर चढकर भगवान के पास पहुंचे थे। इस घटना का जीवन्त दृश्य प्रस्तुत चित्र में है।
जातक कथायें- भगवान बुद्ध कभी छै दांतो वाले हांथी के रूप में अवतरित हुये थे। उन्होने उदारतावश शिकारी को अपने दांत काटने की अनुमति दे दी थी। प्रस्तुत चित्र में शिकारी आरी से दांत काट रहा है। लाॅर्ड कनिंघम को इस कलाकृति का एक हिस्सा तालाब में धोबी द्वारा कपडा धोने के उपयोग में लाते हुये प्राप्त हुआ था।
ग्रीक सभ्यता का प्रभाव- इस देश की कला पर ग्रीक प्रभाव को ज्ञात करने के चित्र उपलब्ध हुये है। प्रस्तुत चित्र में एक ग्रीक पुरूष मशाल लिये खडा है।
समुद्री व्यापार- प्रस्तुत चित्र में समुद्र में व्यापार करने वाले व्यापारी को अतिविशाल ह्ेल मछली द्वारा निगला जाता हुआ दिखाया गया है। अन्ततः बुद्ध ने इसकी रखा की थी। लाॅड कनिंघम ने इस कलाकृति को उंचेहरा के प्रासाद में दबी हुई देखा था। इस समय यह भारत कला भवन वाराणसी की शोभा बढ़ा रही है।
स्थापत्य कला- अतिविशाल चित्र विचित्र झालर, कंगूरे आदि से चित्रित भवनों की झांकी प्रस्तुत चित्र में है। इसके समीप शाक्यमुनि के बोधिवृक्ष के नीचे आनन्द मनाते हुये लोगों का दृश्य।
इंजीनियंरिंग- प्रस्तुत स्तूप का दृश्य उस समय की इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। इसमें कहीं भी बीम या शहतीर का उपयोग नहीं किया गया है। अपितु मेहराब के सिद्धान्त के अनुसार इसका निर्माण किया गया है। यह रचना दर्शन के बुब्बु6ल जातक से अनुप्रेरित है।
सृष्टि विषयक दार्शनिक विचार- पुराणों में ब्रहा्रा की नाभि के कमल से सृष्टि उत्पत्ति का सिद्धान्त विस्तार से वर्णित है। प्रस्तुत चित्र में इसका सजीव चित्रांकन है।
नगर रक्षी यक्ष यक्षिणियाॅ- भरहुत में विविध सामाजिक मान्यताओं को प्रकट करने वाले यक्ष यक्षिणियों का चित्रांकन है। प्रस्तुत कलाकृति में ऋग्वेद के खिलसूक्त में वर्णित श्री मां का अभिलेख सहित सर्वप्रथम चित्रांकन हुआ हैं
आर्य संस्कृति- प्र्रस्तुत स्तूप में आर्य संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले अनेक चित्रांकन है। इस चित्र में कमल पर अवस्थित दो हाथियों द्वारा अभिषिक्त की जाती हुई लक्ष्मी का ठीक वैसा चित्रांकन है, जैसा आजकल उपलब्ध होता है।
वन्य पशु पक्षी- प्रस्तुत स्थान के वन बहुल होने से पशु-पक्षियों का चित्रांकन स्वाभाविक है। इस चित्र मंे बन्दरों द्वारा हांथी को खींचा जाता हुआ हास्य-दृश्य अंकित है।
लोककला संस्कृति - इस स्तूप में बुद्ध के अवशेषों की स्थापना के ऐतिहासिक मंगल अवसर पर अप्सराओं द्वारा नृत्य वाद्य अंकित है। इस समय यह दुर्लभ कलाकृति नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली की शोभा बढा रही है।
नारी शिक्षा- यहां कन्याओं के अध्ययन को प्रस्तुत करने वाले मनोहारी दृश्य अंकित है। एक दृश्य में एक तपस्विनी कुछ कन्याओं को पढ़ रही है।

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