लक्ष्मणबाग में मिलता है चारोधाम की यात्रा का पूण्य, यहां चोरो दिशाओं के देवी देवता है मौजूद:

By Tejnews.com 2021-10-10 धर्म-कर्म     

यूं तो चारोधाम की यात्रा नसीब वाले करते है, क्योकि यात्रा में ना केवल समय और धन खर्च करना पडता है बल्कि विभिन्नता बाधा उत्पन्न करती है। इसके चलते गरीब निर्धन चारोधाम की यात्रा करने से वंचित रह जाते है। मध्यप्रदेश के रीवा में निर्धन गरीब और परेशान भक्तो की चारोधाम यात्रा को ध्यान मे रखते हुए एक ऐसा मंदिर बनाया गया है जहां जिसके परिसर में चारोधाम के देवी देवाओ के दर्शन होते है बल्कि मान्यताएं भी पूरी होती है।
ऐतिहासिक लक्ष्मणबाग ट्रस्ट रीवा मे चारो धाम के भगवान मौजूद है. चारो धाम के भगवान। विंध्य क्षेत्र के गरीब जनता की सुविधाओं को ध्यान मे रखते हुए तत्तकालीन महाराजा विश्वनाथ सिंह ने 1850 में लक्ष्मणबाग ट्रस्ट की स्थापना कराई। केदारनाथ, बद्रीनाथ, बैजनाथ और पुरी से भगवान को लाकर लक्ष्मणबाग मे स्थापित किया। देश मे अलग-अलग दिशाओं मे मौजूद चारोधाम के अलावा यहां पर हरिद्वार, बद्रीनारायण बालाजी त्रिरंगनम, जगदीश स्वामी, रंगनाथ लक्ष्मीनारायण, कस्तूरीनाथ दीनानाथ भगवान को विराजमन किया। आचार्य दीनानाथ त्रिपाठी, व्यवस्थापक, लक्ष्मणबाग ट्रस्ट बताते है कि महाराज विश्वनाथ जी की सोच थी कि विंध्य की गरीब जनता चारोधाम की यात्रा नही कर सकती और इनके मन मे हमेशा यात्रा ना करने का मलाल रहेगा। लिहाजा महाराज खुद चारोधाम की यात्रा पर निकले और जगह जगह में सैकडो ंमंदिरो की स्थापना कराई। चारो दिशाओ से भगवान को गाजे बाजे के साथ धूम धाम के साथ रीवा ले आये। इससे जहां लोगो को चारो धाम की यात्रा की अनुभूति मिलती है और लक्ष्मणबाग में यात्रा दर्शन करने से उन्हे चारोधाम का फल मिलता है।
ऐसा कहा जाता है कि यहां उतना ही महत्व है जितनी की चारोधाम यात्रा का, भक्तो की मान्यताएं पूरी होती है और निर्धन गरीब असहाय जनता को चारों धाम के दर्षन चंद घटो में मिल जाते है। जिससे ना तो भक्तो को चारोधाम के लिए भटकना पडता और ना ही उनका अत्याधिक धन खर्च होता है। लक्ष्मण बाग मंदिर ट्रस्ट की स्थापना तत्कालीन रीवा रियासत के महाराज विश्वनाथ सिंह ने कराई थी। इस ट्रस्ट के आधीन देशभर मे सैकडो मंदिर और अरबों की परिसम्पतियां मौजूद है। जिसमें उडीसा, आन्धप्रदेष, वृंदावन, हरिद्वार और बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थलो पर स्थापित है। तत्कालीन रीवा रियासत के महाराज विश्वनाथ सिंह ने विंध्य की जनता जनार्दन को चारोधाम की यात्रा कराने का बीडा उठाते हुए देश के विभिन्न देव स्थलो की परिक्रमा की और अंत में चारोधाम ट्रस्ट की स्थापना की। महाराज ने ना केवल स्थापना की बल्कि बडे धूमधाम के साथ यहां पर हरिद्वार, बद्रीनाथ, इलाहाबाद, आन्ध्रप्रदेष, तमिलनाडु, उडीसा, वृंदावन, चित्रकूट समेत अन्य धार्मिक स्थलों से विधि विधान के साथ देवी देवताओ का लाकर स्थापित कराया। लक्ष्मण बाग में 13 मंदिरो की स्थापना की गई जिसमे लक्ष्मण जी श्री लक्ष्मीनारायणजी, श्री दीनानाथजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री षठकोष स्वामीजी, श्री व्यंकटेष बालाजी, श्री रंगमन्नारजी, श्री गोदा रंगनाथजी, श्री बद्रीनाथजी, श्री बिहारीजी, श्री जगन्नाथजी, श्री दक्षिणमुखी हनुमानजी और हनुमान का मंदिर बनवाया।
रियासत के महाराज धार्मिक प्रवृत्ति के रहे है, महाराज विश्वनाथ सिह, महाराज रघुराज सिंह और महाराज वेंकटरमण सिंह ने इसके प्रमाण दिये है। कहा जाता है कि महाराज रघुराज सिंह मथुरा में 62178 कीमत के स्वर्ण का तुलादान किया इस तुलादान के उपलक्ष्य में 150000 और व्यय हुये थे। इसी तरह काशी में 5 लाख सोने की मुद्राओ का तुलादान किया था। एक किवदंती है कि महाराज रघुराज सिंह जगन्नाथजी के दर्शनार्थ मंदिर में प्रवेश हुये और यकायक भगवान का फाटक अपने आप बंद हो गया। महाराज रघुराज सिंह फाटक के सामने खडे होकर जगदीश शतक की रचना करने लगे जैसे ही सौवां छंद पूर्ण हुआ, जगन्नाथ जी का फाटक यकायक खुल गया और महाराज रघुराज सिंह को दर्शन मिल गये। यहां पर महाराज नें सोने चांदी और अनाज के तुलादान के अलावा 2 लाख सोने की मुद्रा का भी तुलादान किया। इसके अलावा पचास लाख रूपयो की भूमि क्रय कर जगन्नाथ पुरी में रीवा क्षेत्र की स्थापना की। तब से भगवान जगन्नाथ जी के नैमिम्मित दीपदान का भी प्रबंध राज्य की ओर से करने की व्यवस्था बनाई गई है।
लक्ष्मणबाग में जहां चारोधाम के भगवान के देवी देवाओ का वास है वहीं देश की पवित्र नदियों के जल को भी एक कुंड मे समाहित किया गया है। लिहाजा एक ही परिसर मे चारो के धाम की परिक्रमा और गंगा, जमुना, गोदावरी, नर्मदा का जल चढाने को मिल जाता है। यह पुन्य चारो धाम की यात्रा से किसी मायने में कम नही है।
ऐसा कहा जाता है कि तत्कालीन महाराज विश्वनाथ सिंह के पुत्र महाराज रघुराज सिंह गंभीर बीमारी की चपेट में आ गये थे। उनके स्वस्थ्य के लिए वैद्यों ने कठिन प्रयास किया लेकिन हालत मे कुछ सुधार नही हुआ। बाद में ज्ञात हुआ कि दैविय शक्तियों के प्रकोप के चलते रघुराज सिंह की सेहद मे सुधार नही हो पा रहा है। इन षक्तिाओं को मनाने के लिए महाराज विष्वनाथ सिंह हरिद्वार गये और संतो को लेकर लक्ष्मणबाग आये यहां पूजा अर्चन की और तब जाकर रघुराज सिंह के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। उसके बाद महाराज ने ठान लिया कि वह विध्य क्षेत्र की जनता और दुखियारो के लिए चारोधाम की यात्रा का प्रबंध करेगें।
एक मान्यता यह भी है कि महाराज विश्वनाथ सिंह की मृत्य के बाद एक बार फिर महाराज रघुराज सिंह कोढ कुष्ट रोग की बीमारी के चपेट मे आ गये। ऐसी स्थिति में राजगुरूओ नें भगवान जगन्नाथ की पूजा अर्चना करने का सुझाव दिया और महाराज ने आज्ञा का पालन करते हुए पुरी उडीसा जाकर भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा अर्चन की। कुछ दिनो बाद ही रघुराज सिंह स्वस्थ्य हुये और लक्ष्मणबाग ट्रस्ट को और भी विस्तृत कर दिया साथ ही देषभर में अनेको मंदिरो का निर्माण कराए।
लक्ष्मणबाग में यूं तो प्रतिदिन भक्त दर्षन और परिक्रमा करने आते है लेकिन कुछ रामनवी, जन्माष्ठमी और गुरू पूर्णिमा के मौके भक्तो का ताता लगा रहता है। यहां भक्त गहरी आस्था के साथ आते है और भगवान उनका उतना ही खयाल भी रखते है। लक्ष्मणबाग परिसर में मौजूद 13 मंदिरो के साथ ही शहर मंे कई अन्य मंदिर भी मौजूद जिसमें मथुरानाथ जी रामजनकी मंदिर उपरहटी, श्री रामकृष्ण जी राम जानकी मंदिर, रामसीता जी, मुकाती मंदिर, रामजी भण्डारी वाले, श्री जगन्नाथजी, हनुमानजी चिरहुला, शीतल द्वीप, लक्ष्मीनारायण, पंच मंदिर, हरचन्दराय मंदिर, दुर्बलीनाथ मंदिर, श्री द्वारिकाधीश मंदिर, रघुनाथजी, श्री जगन्नाथजी अखाड, श्री बिहारी जी, श्री जानकीरमण, रामजानकी, लक्ष्मीनारायण प्रमुख है।

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