रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

By Tejnews.com 2020-12-16 द बघेली     

रीवा स्टेट आर्मी की स्थापना लेफ्टि. कर्नल सर वेंकटरमण सिंह के शासन काल में हुई थी। महाराज सेना में बहुत अधिक रुचि रखते थे। 27 जुलाई 1904 को उन्होंने स्वयं रीवा स्टेट आर्मी के कमाण्डर इन चीफ का पद ग्रहण किया था। इन्होंने रीवा के अलावा सतना, बघऊँ और बान्धवगढ़ में फौजी छावनियाँ स्थापित की थीं। रिसाला, पलटन और तोपखाना को आधुनिक बनाया। फौजियों के प्रशिक्षण की अद्यतन व्यवस्था की गयी थी।

पहले रीवा राज्य की सेना, आधे तीतुर, आधे बटेर जैसे होने के साथ ही लसर-भसर हुआ करते थे। उस सेना को आधुनिक रूप देने की खातिर प्रशासन ने मन बनाया। ये जानते हुए कि ब्रिटिस गवरमेंट कभी नही चाहेगी कि देशी राजाओं की सेना संगठन सक्षम हो। बहरहाल प्रशासन मंजूरी के लिए प्रस्ताव किया गया। इस प्रस्ताव मे ंखास मांग इस तरह थी।
1- वर्तमान सेना के बूढे और बीमार जिनकी उम्र 40 वर्ष से काम में लेगे है उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराकर पेंशन दी जाये।
2- सेना के वेतनमान का सुधारा किया जाए, कैवेलरी (घोडसवार) जो रू 16 महीने पाते थे उनका रू 20, इन्फैन्ट्री (पैदल) वाले जो रूपये 5 पाते है उनका 6 और 7 रूपये महीना किया जाये।
3- सेना मे कमी करके कैवेलरी के 542 के एवज में 250, इन्फैन्ट्री के 601 के एबज में 350 लोग रखे जाये। इस संख्या भीतर 37 और 54 अधिकारी भी शामिल रहेगें। इससे आर्टिलरी के 123 अमले में 15 अधिकारी सहित केवल 50 लोग रखे जाये।
4- राज्य के खर्च से शहर के बाहर मिलेट्री लाइन का निर्माण कराया जाये। जहां खासतौर से अफसर और सेना रहेगी। कबायद और हाजिरी जरूरी होगी।
5- राज्य शासन सेना की वर्दी अपने खर्च पर देगी।
6- अनुशासित और व्यवस्थित सेना चलाने की खातिर ब्रिटिश इन्डियन आर्मी से अनुभवी अफसर को उधार सेवा के रूप में बुला कर रखा जाये।

यह मंजूरी मिल गई और सन 1882-83 में 94 लोग कैवेलरी व 81 लोग इन्फैन्ट्री से छाटकर अलविदा कर दिये गये, इन्हे पेंशन दे दी गई। इसके बाद अन्तिम रूप में सेना की संख्या कैवलरी 3 अफसर, 33 नान कमीसन्ड आफिसर, 323 सवार। इन्फैटी में 2 अफसर, 32 नान कमीसन्ड आफिसर, 520 सैनिक। आर्टिलरी 3 आफिसर, 9 नान कमीसन्ड आफिसर, 56 सैनिक। इसके अलावा राज शासन की जो सेना थी उसी में रददो बदल नही किया गया। राज्य में हर इलाकेदार एक छोटी-मोटी सेना पुराने ढंग से रखते थे, उसमें किसी तरह की कोई छेडछाड नही की गई थी। सन 1883-84 मे फौजी लाइन शहर के बाहर मैदान में जेल से 200 गज की दूरी में स्थापित की गई थी। यहीं के एक बैरक मे अस्पताल बनाया गया था, जिसमें 51465 रूपये खर्च आया था।

कैवेलरी के कमाॅडेंट करन सिंह थे इनकी तनख्वाह 200 रूपये मासिक थी और इन्फैन्ट्री के कमाण्ड रायबहादुर हुजूरा सिंह के हांथ में थी, इनकी मासिक तनख्वाह 500 रूपये थी। ये पहले सुबेदार पद पर आये थे। राज्य की पुरानी सेना 1002 थी और नई सेना की संख्या 1266 कुल संख्या 2268 थी। इसके सालभर के खर्च का वजट 228054 रूपये था। जबकि 45552 रूपये पुरानी सेना का खर्च था, ये सेना मजूदार थी। इसमें 313 एक्का सरदार, 234 हुजूर अरदली, 65 मुलुकपियादा और 390 बाॅधोगढ सेना की थी। जिसके लिए गैरिसन बाॅधौगढ था, इसके लिए एक इलाकेदार रहते थे। ये राजीबी बघेल खानदान से हुआ करते थे। इनको 50 रूपये महीना कि तनख्वाह मिलती थी। मुलुकापियादन की संख्या 65 थी, जो गांव मे पुलिस सिपाही की तरह रहते थे या फिर कचहरी अदालत में काम करते थे।

हुजूर अरदली और एक्कासरदार एक तरह से राजनैतिक पिन्सिनियर हुआ करते थे, न तो इनकी गिनती पुलिस मे थी और ना ही फौज के रूप में की जा सकती थी। इन सबका कोई खास काम नही था, कहना चाहिए कि ये महाराज की प्रतिष्ठा ढो रहे थे। हुजूर अरदली खासतौर से राजपरिवार के गरीब संबंधी और नातेदार हुआ करते थे। हुजूर अरदली होने का इनका गुमान हुआ करता था। उनको 2 रूपये से 8 रूपये तक महाबारी भत्ता मिलता था। इनकी कुल संख्या 284 थी और सालभर का खर्च 11054 रूपये था। एक्का सरदार, घोडसवार सैनिक माने जाते थे, ये बिना तनख्वाह वाले ओहदेदार हुआ करते थे। अपने घोडे और औजार का रख-रखाव इनको खुद करना पडता था। बैकुंठबासी महाराज के बाघमार अभियान मे कई तलबारधारी हुजूरअरदली अपनी होशियारी दिखाने में जंगली जानवरों व बाघ के शिकार हो चुके थे और कई होकर मारे गये थे। इनाम वही पाते थे जो अपने प्राण के बारे में नही सोचते थे।

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