महाराजा रामचन्द्र नें खरीदा था कालिंजर का रहस्यमयी किला:

By Tejnews.com 2020-12-09 सैर     

भारत में ऐसे कई रहस्यमय किले मौजूद हैं जो बाहर से देखने पर तो काफी खूबसूरत लगते हैं लेकिन वो अपने अंदर कुछ राज समेटे हुए हैं। एक ऐसा ही रहस्यमय किला है बुदेंलखंड प्रांत में जिसे कालिंजर के किले के नाम से जाना जाता है। बुदेंलखंड प्रांत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में बंटा हुआ है। इस प्रांत के अंदर आने वाले कुछ जिले उत्तर प्रदेश में पड़ते हैं तो कुछ मध्य प्रदेश में पड़ते हैं। वैसे कालिंजर यूपी के बांदा जिले में स्थित है।

कालिंजर का किला भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। प्राचीन काल में यह दुर्ग जेजाकभुक्ति जयशक्ति चन्देलद्ध साम्राज्य के आधीन था। बाद में यह 10वीं शताब्दी तक चन्देल राजपूतों के आधीन और फिर रीवा रियासत के आधीन रहा। हर्षवर्धन, कलचुरियों और प्रतिहारों के शासन के बाद प्रसिद्ध चंदेला राजा के दौरान पूरे बुंदेलखंड और आसपास के क्षेत्र का विस्तार किया गया

11 वीं शताब्दी के पहले भाग में गजनी के महमूद ने कई बार किल्ंजर तक मार्च किया लेकिन विरोध किया गया और वापस जाने के लिए मजबूर किया गया। 1182 ई0 के दौरान दिल्ली और अजमेर के चैहान राजा प्रियव्रजा के नाम से प्रसिद्ध चंदेला राजा परमर्दिदेव को पराजित किया गया था इन राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवीए कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयू जैसे योद्धाओं ने आक्रमण किए लेकिन इस पर विजय पाने में असफल रहे। कालिंजर विजय अभियान में ही तोप का गोला लगने से शेरशाह की मृत्यु हो गई थी और इस तरह कालिंजर पर लंबे चंदेला शासन का अंत हो गया। बाद में रीवा रियासत के महाराज राम चंद्र ने कालिंजर का किला खरीद लिया। लेकिन इसमें अकबर के प्रतिनिधि मजनूं खान कुक्साल द्वारा कब्जा कर लिया गया और कालिंजर किला मुगल प्रभुत्व का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। मुगल बादशाह अकबर ने इस पर अधिकार कर लिया और किले बीरबल को तोहफे में दे दिया। अकबर के नौ रत्नो में एक राजा बीरबल ने कालिंजर को अपना जागीर बना लिया।

इस किले में कई प्राचीन मंदिर भी हैं। इनमें से कई मंदिर तीसरी से पांचवीं सदी यानी गुप्तकाल के हैं। यहां के शिव मंदिर के बारे में मान्यता है कि सागरण्मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहीं तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी।

यहां स्थित नीलकंठ मंदिर को कालिंजर के प्रांगण में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण और पूज्यनीय माना गया है। कहते हैं कि इसका निर्माण नागों ने कराया था। इस मंदिर का जिक्र पुराणों में भी है। इस मंदिर में एक शिवलिंग स्थापित हैए जिसे बेहद प्राचीनतम माना गया है। नीलकंठ मंदिर के ऊपर ही जल का एक प्राकृतिक स्रोत हैए जो कभी सूखता नहीं है। इसी जल से मंदिर में मौजूद शिवलिंग का अभिषेक निरंतर प्राकृतिक तरीके से होता रहता है। वैसे बुंदेलखंड का यह इलाका सूखे के कारण जाना जाता हैए लेकिन यहां कितना भी सूखा पड़ेए जल का यह स्रोत कभी नहीं सूखता है।
कहते हैं कि कालिंजर के किले में कई रहस्यमयी छोटी-बड़ी गुफाएं भी मौजूद हैं। इन गुफाओं के रास्तों की शुरुआत तो किले से ही होती हैए लेकिन यह कहां जाकर खत्म होती हैए यह कोई नहीं जानता।

जमीन से 800 फीट की ऊंची पहाड़ी पर बना कालिंजर का यह किला जितना शांत हैए उतना ही खौफनाक भी। कहते हैं कि रात होते ही यहां एक अजीब सी हलचल पैदा हो जाती है। लोगों का मानना है कि यहां मौजूद रानी महल से रात को अक्सर घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है। यही वजह है कि यहां दिन के समय तो लोग घूमने के लिए आते हैंए लेकिन रात होने से पहले ही वो यहां से निकल जाते हैं।

इस किले में प्रवेश के लिए सात दरवाजे बने हुए हैं और ये सभी दरवाजे एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। यहां के स्तंभों और दीवारों में कई प्रतिलिपियां बनी हुई हैं। मान्यता है कि प्रतिलिपियों में यहां मौजूद खजाने का रहस्य छुपा हुआ हैए जिसे अब तक कोई भी ढूंढ नहीं पाया है।

इस किले में सीता सेज नामक एक छोटी सी गुफा हैए जहां एक पत्थर का पलंग और तकिया रखा हुआ है। माना जाता है कि यह जगह माता सीता की विश्रामस्थली थी। यहीं एक कुंड भी हैए जो सीताकुंड कहलाता है। किले में बुड्ढा और बुड्ढी नामक दो ताल हैंए जिसके जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। मान्यता है कि इनका जल चर्म रोगों के लिए लाभदायक है और इसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाता है।

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