आदिशक्ति माॅ भरजुना, करती है भक्तों का बेडापार:

By Tejnews.com 2020-12-09 द बघेली     

सतना जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर माँ भवानी का ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है। यहां माॅ आदिशक्ति विराजमान है यह अपने भक्तों का बेडापार करती है, सर्व मनोकामना पूरी करती है और बिगडे काम को बनाती है। मान्यता है यहां आने वाले कभी भी निराश होकर नही लौटते। इसी आस्था और विश्वास के साथ हजारों भक्त माॅ भरहुना के मंदिर में माथा टेकते है।
माॅ भरजुना दुर्गा मंदिर निर्माण के बारे में बताया जाता है कि यह 18 वीं शताब्दी में मूलतः बेल्हा बिलखारगढ़ प्रतापगढ़ से आए सूर्यवंशी बिलखि बेलखरिया दिखित् क्षत्रियों द्वारा स्थानीय भर कबीले के सरदार को हराने के बाद हुआ था। इसी कारण यह भरजुना नाम पड़ा। आज भी उस समय के ध्वस्त किये गए गढ़ के अवशेष गाँव में मौजूद है। भरजुना के संबंध में किंवदंतियां कहती जाती है। लगभग उसी दौरान सोहवाल के बघेल राजा ने कोठी के भर सरदार को हरा कोठी प्रिंसली स्टेट की स्थापना की थी। प्रतापगढ़ से आये दिखित् युद्ध कौशल में निपुण् थे और इतिहास अनुसार माना जाता है की इसीलिए दो भाई उद्धव सिंह और माधव सिंह बेलकैत दीक्षित ने बघेल राजा की सेना में कोठी स्टेट की स्थापना में हुए युद्ध में भाग लिया। एवं तत्पश्चात भरजुना में ही काफी बड़े क्षेत्र में रहने लगे। कुछ ही दूर मौजूद गोरैय्या स्टेट के दीक्षित राजा साहेब का भी उन्हे समर्थन प्राप्त रहा था।
मूलतः बेल्हा गांव प्रतापगढ़ से होने के कारण कालांतर में स्थानीय भाषा में क्षत्रिय बिलकैत बिलखित् एवं उनके साथ आये ब्राहमण बिलगावंहा कहे जाते हैं। गौरतलब है की आज भी बेल्हा में बिलखरिया दीक्षितों की गढ़ी के अवशेष मौजूद हैं एवं दीक्षित शक्ति के उपासक होते हैं इसलिए इसी प्रकार का देवी मंदिर बेल्हा में बेल्हा देवी नाम से काफी प्रसिद्ध हैए वही बिलखरनाथ नाथ महादेव की स्थापना भी इन्हीं ने की थी जो आज भी भव्यता से मौजूद है।
एक प्रचलित लोककथा यह भी है की यह गांव पहले कुंदनपुर के नाम से जाना जाता था क्योंकि कृष्ण रुकमणि विवाह यही से हुआ था। किंतु धार्मिक ग्रंथों में उस कौंदन्यपुर का वास्तविक स्थान महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले में बताया गया है जहाँ आज भी वह स्थान विश्व प्रसिद्ध है।
कुछ इतिहासकार कहते हैं की बिलखित् दीक्षितों के पहले यहाँ भर कबीले ने भी कई मंदिर बनाए जिनके अवशेष आज भी मिलते हैं। उन्में से कुछ बुद्धकालीन एवं चंदेल वंश के समय और शैली की भी हैं। भर कबिला इस क्षेत्र में काफी वक्त तक था और विश्व प्रसिद्ध भरहुत और आसपास के क्षेत्र में भी वे मौजूद थे।

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