महाराजा रघुराज सिंह की महारानी जिनके इनके शरणागत को प्राप्त था अभयदान:

By Tejnews.com 2020-12-08 द बघेली     

यूं तो रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह के बारह विवाह हुये थे। लेकिन इन सबमे एक ऐसी महारानी बडी ही स्वाभिमानिनी थीं। इनकी डयौढी में शरणाश्रिय अपराधी से अपराधी व्यक्ति को क्षमादान के लिए महाराज रघुराज सिंह प्रतिज्ञाबद्ध थे। इतना ही नहीं इनकी डयौढी के सामने से सिर खोलकर चलना, छाता लगाना आदि प्रतिबंधित थे। आइये जानते हैं महाराज रघुराज सिंह की प्रमुख महारानी रनावट साहिबा के बारें में जिनसे सशर्त हुआ था महाराज का विवाह।

उन दिनो राजाओं महाराजाओं में बहु विवाह प्रथा प्रचलित थी। तदनुसार महाराज रघुराज सिंह ने बारह विवाह किये थे। महाराज रघुराज सिंह का पहला व्याह विसं 1902 में भदरी नरेश बिसेन राजा राव गोपाल सिंह की पुत्री जागेश्वरी कुॅवरि के साथ हुआ था। विसं 1907 में दूसरा विवाह करने के पूरे राजसी ठाटबाट के साथ उदयपुर राजस्थान के लिए प्रस्थान किया। विसं 1908 बैशाख सुदि 7 को उदयपुर पहुंच कर विवाह की तैयारी में संलग्न हो गये किन्तु शर्तो के झगडे के कारण शादी सम्पन्न न हो सकी। यह शादी विसं 1890 में महाराज विश्वनाथ सिह ने तय की थी। उस समय उन्होंने यह शर्त लिखा दी थी कि रनावट महारानी साहबा से पैदा हुआ पुत्र ही युवराज पद का अधिकारी होगा। जिस समय महाराज रघुराज सिंह उदयपुर विवाह के लिए प्रस्तुत हुये, उनके सामने भी यही शर्त रखी गई। महाराज रघुराज सिंह इस शर्त को मानने के लिए तैयार नही हुये क्यों कि 1903 में विजयपुर की गहरवारिन महारानी से युवराज राघव बरम सिंह का जन्म हो चुका था। विवाह की उक्त शर्त न मानने के कारण उदयपुर का विवाह स्ािगित हो गया। लौटते समय उदयपुर से पुन विवाह का प्रस्ताव महाराज रघुराज सिंह को प्राप्त हुआ जिसमें निम्नलिखत शर्ते प्रस्तुत की गई-

1 रनावट महारानी साहब की बैठक सब महारानियांे से उंची रहेगी।
2 इनके शरणागत को अभयदान प्राप्त रहेगा।
3 इनकी डयोढी के सामने से छाता लगाकर, सवारी पर चढकर, दाढी बढाकर कोई भी न निकल सकेगा।
4 इनका कोई भी आदेश महाराज की ओर से अमान्य न होगा।
इन शर्तो को महाराज रघुराज सिंह ने स्वीकार कर लिया और शादी हो गई।

महारानी सौभाग्य कुंवरि ने 1932 में 161287 की लागत का भगवान मदनमोहन का मंदिर लखोंरी बाग में निर्माण कराया जिसकी प्रतिष्ठा 1933 को की गई। इस मंदिर के राग भोग के लिए तीन गांवों की आमदनी भी लगी हुई थी। मंदिर के पास ही रघुराज सागर तालाब का निर्माण कराकर बडा बगीचा लगवाया गया।

महाराज रघुराज सिंह की महारानियां-
1 महारानी जागेश्वरी कुंवरि- भदरी के विसेन राजा राव गोपाल सिंह की पुत्री।
2 महारानी सौभाग्य कुंवरि- रनावट साहिबा उदयपुर के सिशौदिया महाराणा श्री सरूपसिंह की बहन।
3 महारानी रूकिमणी प्रसाद कुंवरि- विजयपुर गहरवार राजा अमरजीत सिंह की पुत्री।
4 महारानी शिवदान कुंवरि- सिलपरा के चंदेल ठाकुर विजय बहादुर सिंह की पुत्री।
5 महारानी शिवपाल कुंवरि- धारूपुर के राजा हनुमंत सिंह की पुत्री।
6 महारानी ध्यान कुंवरि- टेंगुहाई।
7 महारानी लक्ष्मणि कुंवरि- विजयपुर के गहरवार राजा अमरजीत सिंह की पुत्री।
8 महारानी सूर्य कुंवरि- विजयपुर के गहरवार जगत बहादुर सिंह की पुत्री।
9 महारानी सिरताज कुंवरि- विजयपुर के गहरवार राजा अमरजीत सिंह की द्वितीय पुत्री।
10 महारानी जगन्नाथ कुंवरि- सिलपरा के चन्देल ठाकुर विजय बहादुर सिंह की द्वितीय पुत्री।
11 महारानी जानकी प्रसाद कुंवरि- तिलई के गहरवार ठाकुर अमरसिह की पुत्री।
12 महारानी धर्मराज कुंवरि- नागौद राज्यन्तर्गत ठिकाना पतौरा के परिहार ठाकुर गिरिधर बकस सिंह की पुत्री।

महाराज की बारहों महारानियां बडी ही धार्मिक और उदार हदया थीं। इनको राज्य की ओर से पवाईयां मिली हुई थीं। इन्होंने अपनी पवाई के गांवों में तालाबों के साथ-साथ मंदिरों का भी निर्माण कराया था।

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