आशु कवि थे महाराज रघुराज सिंह जू देव:

By Tejnews.com 2020-12-07 द बघेली     

रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह परम वैष्णव भक्त तथा उच्च कोटि के साहित्य सेवी थे। उनके दरवार में कवियों का विशेष मान था। वे स्वयं भी अच्छी कविता करते थे। उनकी रचनाओं का मुख्य विषय था भगवदभक्ति। कवि के रूप में उनका एक विशेष गुण था- आशु रचना अर्थात बिना पहले से तैयारी किये हुये तुरंत कविता बनाने लग जाना।
एक समय की बात है जब आप रीवा के प्रसिद्ध मन्दिर लक्ष्मणबाग में निवास कर रहे थे, एक कविराज आपके दर्शनार्थ पधारे और आपकी प्रशंसा में यह कविता सुनाने लगे-

एक रघुराज महाराज इक्ष्वाकु-वंश,
एक रघुराज दशरत्थ सुख-साज हैं।
एक रघुराज बान्धवेश विश्वनाथ-नन्द,
एक रघुराज हेम-तुला सिरताज हैं।
एक रघुराज दीन्हो लक्ष-लक्ष कई बेर,
एक रघुराज दीन-दुख हरताज हैं।
एक रघुराज मैं गनाउॅं सुनो महाराज,
तामैं आप सांची कहौ कौन रघुराज हैं।

हे महाराज! रघुराज अनेक हैं। एक रघुराज महाराज तो इक्ष्वाकु-वंश में हुए। और एक आनन्द देने वाले रघुराज दशरथ के पुत्र राम है। एक रघुराज बान्धवेश महाराज विश्वनाथ सिंह के पुत्र हैं। एक रघुराज वे हैं जिन्होंने कई सोने का तुलादान किया है। एक रघुराज वे हैं जिन्होने कई बार लाखों रूपयों का दान किया है। एक रघुराज वेहै। जो गरीबों के दुख दूर करते रहते है। इतने रघुराजों में से कहिये महाराज! आप कौन से रघुराज है।
कविता समाप्त होते ही महाराज ने बडी नम्रता से कविता में ही उत्तर दिया-
मैं तो कहौं साॅंची जैसो वेद औ पुरान सुन्यौ,
रवि-कुल -कमल - दिनेश रघुराज है।
और इक्ष्वाकुवंश विदित वसुंधरा में,
महाराज भयो एक दानपी रघुराज है।
राजन को राज, महाराजन को महाराज,
लाज को रखैया दशरत्थ युवराज है।
लंकराज-नाशी सेतुबन्ध को प्रकासी सोई,
अवध-विलासी ताको दास रघुराज है।

जो वेदों और पुराणों में लिखा है, वही सत्य मैं कहता हूं कि सूर्यवंश- रूपी कलम को सूर्य के समान प्रसन्न करने वाले ही रघुराज हैं। वे ही संसार में प्रसिद्ध महादानी महाराज हैं। महाराजाओं के महाराज और दीनों की लज्ज रखनेवाले वे ही रघुराज, महाराज दशरथ के सुपुत्र है। लंका का विनाश करने वाले, सागर पर पुल बांधने वाले तथा अयोध्या मे रहने वाले उन रघुराज राम का ही सेवक मै रघुराज हूं।

कविराज, महाराज की इस काव्य-प्रतिभा को देखकर अवाक रह गये। वास्तव में महाराज रघुराज सिंह ऐसे ही महान आशु कवि थे।

Similar Post You May Like

  • भक्तिमय, पौराणिक एवं आध्यत्मिक परंपरा को जीवित रखने के लिए 181 वर्षो से निरन्तर चल रही है रामलीला।

    भक्तिमय, पौराणिक एवं आध्यत्मिक परंपरा को जीवित रखने के लिए 181 वर्षो से निरन्तर चल रही है रामलीला।

    रीवा के नृत्व राघव मंदिर में निरंतर 181 सालों से रामलीला का मंचन किया जा रहा है. भक्तिमय, पौराणिक, आध्यत्मिक और धार्मिक परंपरा को जीवित रखने के लिए यह निरन्तर चली आ रही है। दूर-दूर से श्रध्दालु इसे देखने आते है और देर रात तक रामलीला का रसपान करते है। रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह ने नृत्य राघव मंदिर में रामलीला कि शुरू की थी. प्राचीन नृत्य राघव मंदिर लगभग 450 वर्ष पुराना है यहाँ भगवान

  • जानिये, विन्ध्य के चंदेलों का सिंगरौली फसाद, जो ब्रिटिश गवर्नमेण्ट तक पहुंचा

    जानिये, विन्ध्य के चंदेलों का सिंगरौली फसाद, जो ब्रिटिश गवर्नमेण्ट तक पहुंचा

    विन्ध्य में चंदेल राजाओं की भी बडी स्टेट हुआ करती थी, जो सिंगरौली से लेकर उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती इलाके तक फैली थी। यह स्टेट बघेल रियासत के पूर्व-दक्षिण में चंदेलों का 700 मौजा वाला सिंगरौली ताल्लुका रहा था। ब्रिटिश राज के दौरान मिर्जापुर जिला में जुडी हुई सिंगरौली जागीर रही है। इस जागीर के राजा नरेन्द्र सिंह थे, जिन्होने सन 1871 में एजीजी के यहां दावा पेश किये थे कि रीवा दरबार को 9 हजा

  • जानिए कहां बनी रीवा रियासत की उपराजधानी, यहां कैसे बना विश्वनाथ सरोबर:

    जानिए कहां बनी रीवा रियासत की उपराजधानी, यहां कैसे बना विश्वनाथ सरोबर:

    व्हाइट टाइगर के ब्रडिंग सेंटर होने से दुनियाभर में रीवा का गोविन्दगढ सुर्खियों में आया था लेकिन क्या आप जानते है यह रीवा रियासत की उपराजधानी का गौरव हासिल करने वाला इलाका भी है। यहां कि तीन खूबियां प्रसिद्ध है, पहला तो दुनियाभर में चर्चित सफेद बाघ, दूसरा सुन्दरजा आम और तीसरा विश्वनाथ सरोबर। हम बात कर रहे है रीवा जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर गोविन्दगढ कस्बे की, यह इलाका सन 1856 में

  • पेशवा वंशज की 10 हजार सेना के बाद भी 200 राजपूतों ने यशवंत राव का कलम कर दिया था सर

    पेशवा वंशज की 10 हजार सेना के बाद भी 200 राजपूतों ने यशवंत राव का कलम कर दिया था सर

    पेशवा वंशज की 10 हजार सेना के बाद भी 200 राजपूतों ने यशवंत राव का कलम कर दिया था सर, बहुचर्चित नैकहाई युद्ध में कलचुरि और परिहार राजपूतों ने दिलाई थी जीत.. वीरों की पावन जन्मभूमि रीवा में नैकहाई युद्ध् बहुचर्चित है। इस राज्य के वीररत्नों ने जो त्याग और पोरूष दिखाया है उसका इतिहास अमर है। तीन सदियाँ बीत जाने के बाद भी नैकहाई युद्ध की चर्चा आज भी होती है। इस युद्ध को लेकर कई तरह की किंबदंत

  • बघेल रियासत के पहले और आखिरी राजा थे महाराज अमर सिंह जिन्हे प्राप्त थी बादशाह शाहजहाँ से पंचहजारी मनसब..

    बघेल रियासत के पहले और आखिरी राजा थे महाराज अमर सिंह जिन्हे प्राप्त थी बादशाह शाहजहाँ से पंचहजारी मनसब..

    विन्ध्य का एक बडा भू-भाग बघेल रियासत रीवा राज्य में था। महाराज विक्रमादित्य दिल्ली सम्राट जहाँगीर के समकालीन थे। महाराज विक्रमादित्य के आने से पूर्व सन् 1554 में यहाँ एक बस्ती का निर्माण शेरशाह सूरी के पुत्र जलाल खाँ (सलीमशाह) के द्वारा कराया गया था। अपने पिता की मृत्यु का समाचार पाकर जलाल खाँ यहीं से कालिंजर गया था और उसके पश्चात् सलीमशाह के नाम से दिल्ली के सिंघासन पर बैठा था। जलाल

  • ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय छात्र आंदोलन से हिल गई थी मुख्यमंत्री बोरा की कुर्सी..

    ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय छात्र आंदोलन से हिल गई थी मुख्यमंत्री बोरा की कुर्सी..

    यूं तो आपने कई तरह के आंदोलनों को सुना और देखा होगा लेकिन एक छात्र आंदोलन ऐसा है जो इतिहास के पन्नों में ‘गधा आंदोलन’ के नाम से दर्ज हो चुका है। ऐसा छात्र आंदोलन शायद अब कभी नही होगा, इस अनोखें आंदोलन में 3 हजार से अधिक छात्रों पर लाठियां बरसाई गई थी और 1 महीनें तक छात्र नेता जेल की सलाखों में कैद रहे है। रीवा, शहडोल, जबलपुर सागर संभाग के छात्रों के साथ ही भोपाल तक इसकी गंूज पहुंच गई थी। छ

  • बघेली को सशक्त पहचान दिलाई इन्हे कहते है बघेली महाकवि सैफुद्दीन सिद्धीकी सैफू:

    बघेली को सशक्त पहचान दिलाई इन्हे कहते है बघेली महाकवि सैफुद्दीन सिद्धीकी सैफू:

    विन्ध्य की एक ऐसी शख्सियत जिसने कविता, कहानी, पहेलियों और उपन्यास के माध्यम से बघेली को सशक्त पहचान दिलाई। इन्होनें न सिर्फ नए आयाम दिये बल्कि एक सुदृढ काव्य परम्परा भी प्रदान की है। सैफुद्दीन सिद्धीकी सैफू को इसीलिए बघेली का महाकवि कहा जाता है। सैफू का जन्म जुलाई 1923 मेें अमरपाटन तहसील के रामनगर जिला सतना में हुआ था। बाणसागर परियोजना से विस्थापित होने के बाद गढियाटोला सतना मेें ब

  • रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी की स्थापना लेफ्टि. कर्नल सर वेंकटरमण सिंह के शासन काल में हुई थी। महाराज सेना में बहुत अधिक रुचि रखते थे। 27 जुलाई 1904 को उन्होंने स्वयं रीवा स्टेट आर्मी के कमाण्डर इन चीफ का पद ग्रहण किया था। इन्होंने रीवा के अलावा सतना, बघऊँ और बान्धवगढ़ में फौजी छावनियाँ स्थापित की थीं। रिसाला, पलटन और तोपखाना को आधुनिक बनाया। फौजियों के प्रशिक्षण की अद्यतन व्यवस्था की गयी थी। पहल

  • जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    अब तक आपने रीवा स्टेट के बारे में पढा सुना है लेकिन रीवा स्टेट से लगी हुई सेंगर राजपूतों की 'मऊ स्टेट' भी थी जिसके बारे में कम लोगों को ही जानकारी है। यह स्टेट सेंगर राजाओं के अधिपत्य में थी और इस राज्य में कई जागीरे भी शामिल थी। मऊ स्टेट बघेलर स्टेट से पुरानी मानी जाती है। बघेली स्टेट के 34 शासको ने राज्य किया जबकि सेंगर रियासत में 51 से अधिक वंशजों ने रियासत चलाई। सेंगर इकलौती रियासत थी

  • बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    आपको जानकर यह हैरानी होगी कि बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म बघेलखण्ड में हुआ था। इतना ही नही रियासत के महाराज अजीत सिंह नें बादशाह और उसकी मां को प्रश्रय दिया था। गढी में और बादशाह की हिफाजत की। अब इसी इलाके में दुनिया की इकलौती व्हाइट टाइगर सफारी मौजूद है। जी हां हम बात कर रहे है मुकुदपुर की जहां बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म हुआ था। दरअसल जिस समय महाराज अजीत सिंह (सन् 1755-1809) रियासत की गद

ताज़ा खबर

Popular Lnks