जनिये आखिर कैसे मिली थी तिवारियो को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी:-

By Tejnews.com 2020-12-07 द बघेली     

बघेलखण्ड में बघेल रियासत का कीर्तिमान स्थापित करने में तिवारियों का अहम स्थान रहा है। बघेल रियासत के अभ्यूदय और विकास के साथ ही रीवा राज्य के तिवारी "अधरजिया तिवारी" कहलाने लगे थे। तिवारी से "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिलने के पीछे सौर्य एवं पराक्रम की गाथा जुडी हुई है। इसी से प्रभावित होकर बघेलों के आदिपुरूष ने तिवारियों को "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिली थी। इसलिए यह जानना जरूरी है कि बघेलों के आदिपुरूष बाघदेव का कैसे विन्ध्य में विस्तार और विकास हुआ।

दरअसल बाघदेव दक्षिण सोलंकी सम्वत् 631 यानी सन् 1233-34 में गुजरात से चलकर अनेक तीर्थों का भ्रमण तथा सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए चित्रकूट पहुँचे थे। चित्रकूट में पहुँचकर उन्होंने आसपास के क्षेत्र को देखा। उस समय वहाँ पर कोई सुदृढ़ सत्ता नहीं थी। तरौंहा में चन्द्रावत परिहारों का राज्य था, जिसके राजा मुकुन्ददेव थे। कालिंजर भटों के राज्य के अन्तर्गत था। ‘बाघदेव’, जिन्हें ‘व्याघ्रदेव’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है, ने कालिन्जर से 16 मील उत्तर पूर्व की और पहाड़ी पर चन्देलों के रिक्त दुर्ग ‘‘मरफा’’ पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और उन्होंने अपने रक्षार्थ अपने साथ आये हुए लोगों की जो बस्ती बसाई उसका नाम ‘‘बघेलवारी’’ पड़ गया। बांदा गजेटियर के अनुसार व्याघ्रदेव का प्रभुत्व इस किले के उत्तर में 15 मील (24 किमी.) ‘‘बघेल भवन’’ और दक्षिण में 15 मील (24 किमी) ‘‘बघेलन नाला’’ तक था। व्याघ्रदेव ने भटदेश के राजा से कालिंजर छीन लिया और साथ ही पड़ोसी मण्डीहा राजा को जीतकर उसका राज्य ले लिया। मण्डीहा रघुवंशी राजा था। गहोरा में लोधियों के राज्य में भी व्याघ्रदेव ने अधिकार कर लिया। इनका पाश्र्ववर्ती राज्य तरौंहा का था, जिसके शासक मुकुन्ददेव चन्द्रावत परिहार थे। उन्होंने अपनी इकलौती बेटी ‘‘सिन्दूरमती’’ का ब्याह व्याघ्रदेव के साथ कर दिया। इनके दूसरी कोई सन्तान भी न थी, लिहाजा अपना राज्य भी इन्हीं को सौंप दिया। इस तरह 13वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर ‘‘बघेल’’ राजपूतों का आधिपत्य हुआ। व्याघ्रदेव का एक विस्तृत भू-भाग में अधिकार हो गया। इन्होंने अपनी राजधानी गहोरा में स्थापित की। गहोरा रीवा पठार के तलहारी क्षेत्र में स्थित था। वर्तमान समय में गहोरा बाँदा-चित्रकूट जिला, उत्तरप्रदेश में स्थित है। कर्बी से 14 मील पूर्व रयपुरा गाँव के निकट उसके दक्षिण में बह रही दो नदियों के मध्य ‘‘गहोरा खास’’ नामक गाँव बसा है। गहोरा के दो हिस्से थे। एक तो ‘‘गहोराखास’’ और दूसरा ‘‘गहोराघाटी’’ था। व्याघ्रदेव की परिहारिन ठकुराइन से दो पुत्र हुए जिनमें कर्णदेव गहोरा की गददी में काबिज हुए और दूसरेे पुत्र कन्धरदेव कसौटा और परदमा के ठाकुर हुए।

करणदेव की राजधानी ‘गहोरा’ में थी। इनका विवाह सोमदत्त करचुलि की सुपुत्री पद्मकुँवरि के साथ हुआ था। सोमदत्त ने करणदेव को ‘बान्धवगढ़’ का किला दहेज में दिया था। करणदेव ने अपने राज्य का विस्तार गहोरा से बान्धवगढ़ क्षेत्र तक किया था। उन्होंने भरगढ़ (वर्तमान बरगढ़), भारभुक्त (भरहुत), भैंसवार आदि ठिकानों पर प्रभुत्व स्थापित करते हुए कैमोर पठार पर भी अधिकार जमा लिया था। उस दौरान लोधियों की सम्पूर्ण सेना तिवारियों के आधिपत्य में थी। एक दिन जब लोधियों के यहाँ महोत्सव हो रहा था और वे सब मदिरा पीकर उन्मत्त थे, उसी समय उनकी ही सेना लेकर इन्होंने चढ़ाई कर दी और विजय प्राप्त की। इसके पश्चात् महाराज व्याघ्रदेव ने तिवारियों को आधा राज्य देना चाहा, जिसे इन लोगों ने स्वीकार नहीं किया। तब महाराज ने तिवारियों को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी प्रदान की। उसी दिन से रीवा राज्य के तिवारी ‘‘अधरजिया’’ कहलाने लगे।

हरवंश राय तिवारी ने सन् 1880 में लिखा है कि, व्याघ्रदेव सन् 1233-34 में गुजरात से अपने कुछ साथियों के साथ पूर्व की ओर तीर्थ यात्रा के लिए चल पड़े थे। इन्होंने गहौरा पर कब्जा कर लिया और कालिंजर गढ़ के किले में रहकर वहाँ राज्य करने लगे। कुछ समय बीतने पर उनसे तिवारियों, से जो लोधियों के मंत्री थे, मित्रता हो गई। उन्होंने तिवारियों से कहा कि यदि ‘‘डहार’’ राज्य में आप हमारा अधिकार करा दें तो आपको आधा राज्य मैं बांट दूँगा। आप मेरे गुरु और कुल पूज्य हैं; अस्तु आप हमारी सहायता कीजिए। इस तरह व्याघ्रदेव और तिवारियों के बीच मंत्रणा हुई।

जौनपुर के शर्की सुल्तानों के साथ इनके पूर्ववत मित्रता के संबंध थे। जौनपुर के नवाब हुसेनशाह शर्की को महाराज भीर देव ने बान्धवगढ़ में दिल्ली सम्राट बहलोल खाँ लोदी के विरुद्ध शरण दी थी। हुसैनशाह शर्की जौनपुर का अधिकारी था। इस घटना से क्रुद्ध होकर दिल्ली सम्राट बहलोल खाँ लोदी का पुत्र सिकन्दर लोदी ने सन् 1494 में बान्धवगढ़ पर चढ़ाई करने का निर्णय लिया। सिकन्दर लोदी की सेना कान्तित क्षेत्र तक पहुँच गयी थी। हर बार संकट की घटी में तिवारियो नें सूझबूझ का परिचय दिया और कभी पीछे मुड कर नही देख और ना ही किसी के आगे हार मानी। बाघदेव तिवारियों के इसी हुनर के कायल थे। वर्तमान में रीवा राज्य के साथ ही आसपास अधरजिया तिवारियो के वशंज मौजूद है। अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगे तो लाइन और शेयर जरूर करें।

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