महाराज मार्तण्ड सिंह नें दिलाई थी दुनिया को व्हाइट टाइगर की पहचान:

By Tejnews.com 2020-12-07 द बघेली     

बघेल रियासत के 34वें महाराज के महाराज मार्तण्ड सिंह के नाम कई बडी उपलब्धियां रही। राजतंत्र लेकर प्रजातंत्र तक में मार्तण्ड सिंह नें अपनी अनूठी छाप छोडी है। महाराज मार्तण्ड नें दुनिया को जहां व्हाइट टाइगर की पहचान कराई वहीं रिमाही जनता को आजादी के पहली ही 1946 में राजतंत्र से आजाद कर दिया था।

गोविन्दगढ़ किला के दरिया महल में 15 मार्च 1923 को मार्तण्ड सिंह का जन्म हुआ था। जब यह समाचार रिमही जनता को प्राप्त हुआ कि बान्धवीय नरेश महाराज गुलाब सिंह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है, तो प्रसन्न होकर प्रजा सड़कों पर उमड़ पड़ी। समूचे रीवा नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया। शिशु मार्तण्ड का व्यक्तित्व वास्तव में सूर्य के समान था। उनके मुख को देखने से यह प्रतीत होता था कि जैसे लालिमायुक्त सूर्य का उदय हुआ है। नामकरण के समय यहाँ के कवियों ने कहा कि, ‘‘विन्ध्य क्षेत्र पावन परम्, श्रुति कह रेवा खण्ड। व्याघ्रदेव के वंश में उदित महा मार्तण्ड।।’’ इस तरह युवराज का नामकरण हुआ और मार्तण्ड सिंह नाम रखा गया। युवराज मार्तण्ड सिंह को गोविन्दगढ़ से रीवा लाया गया और व्यंकट भवन में उनका लालन-पालन प्रारंभ हुआ।

19 अक्टूबर 1923 को युवराज मार्तण्ड सिंह का पसनी संस्कार वेंकट भवन में धूमधाम के साथ सम्पन्न हुआ। बाल्काल से युवराज मार्तण्ड सिंह का उच्चारण अत्यन्त साफ व शुद्ध था। बाल्यकाल से ही वे समय के पाबंद थे। कुछ दिनों बाद मार्तण्ड सिंह अपनी माताश्री के साथ शिमला चले गये। 2 नवम्बर 1927 को जब महाराज गुलाब सिंह अपनी पहली यूरोप यात्रा पर गये, तो साथ में युवराज मार्तण्ड सिंह को भी ले गये थे। युवराज मार्तण्ड सिंह अपने पिता के साथ लगभग दो वर्ष बाल्यकाल में यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा की। अपने पिता महाराज गुलाब सिंह के साथ यूरोप से वह 9 फरवरी 1929 को वापस रीवा आये।

24 मार्च 1929 को युवराज मार्तण्ड सिंह का मुण्डन संस्कार सम्पन्न हुआ। 12 अगस्त 1931 को जब महाराज गुलाब सिंह गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु यूरोप गये, तब युवराज भी उनके साथ गये तथा उन्हीं के साथ 19 अक्टूबर 1931 को वापस रीवा आये। इसी वर्ष 22 दिसंबर 1931 को उनका कर्णवेधन संस्कार सम्पन्न हुआ। महाराज गुलाब सिंह ने युवराज मार्तण्ड सिंह के लिए सन् 1925-26 में ‘‘युवराज भवन’’ (वर्तमान समय में सैनिक स्कूल) का निर्माण कराया था। युवराज भवन और उसके आसपास की भूमि का रकबा 275 एकड़ था।

युवराज मार्तण्ड सिंह की प्रारंभिक शिक्षा हेतु अनेक विषयों के विद्वानों को रखा गया था। प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् उन्होंने डेली कालेज इन्दौर तथा मेयो कालेज अजमेर में शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात् देहरादून में आई.सी.एस. के प्रशिक्षण से प्रशासन का ज्ञान प्राप्त किया। इसके अलावा उन्होंने मैसूर और उटकमण्ड में प्रशासन की व्यावहारिक बातें भी सीखीं। युवराज मार्तण्ड प्रारंभ से ही मेधावी एवं कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने सभी धर्मों के महत्वपूर्ण ग्रन्थों का अध्ययन किया था। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे, किन्तु उन्हें सबसे ज्यादा आनन्द बघेली भाषा बोलने में आता था। वे रीवा के लोगों से ठेंठ बघेली में ही बाते किया करते थे।

कच्छ-भुज के नरेश मिरजा महाराज विजय राव सिंह अपनी पुत्री राजकुमारी प्रवीण कुमारी का विवाह रीवा नरेश महाराजा गुलाब सिंह के सुपुत्र युवराज मार्तण्ड सिंह के साथ करना चाहते थे। इस हेतु महाराज रीवा के पास अपना प्रस्ताव भेजा। सन् 1943 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन युवराज मार्तण्ड सिंह का विवाह राजकुमारी प्रवीण कुमारी के साथ बम्बई में सम्पन्न हुआ। राजकुमारी प्रवीण कुमारी साहित्य, कला, संगीत आदि विषयों में पारंगत थी। वे अपने नाम ‘‘प्रवीण’’ यानी ‘‘दक्ष’’ के अनुसार सभी गुणों से युक्त थीं। विवाह पश्चात् युवराज मार्तण्ड सिंह रीवा आये। युवराज मार्तण्ड सिंह का गोविन्दगढ़ से विशेष लगाव था।

महाराज गुलाब सिंह के संबंध ब्रिटिश सरकार के साथ अत्यन्त खराब होते जा रहे थे और अन्ततः 31 जनवरी 1946 को उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा राज्याच्युत कर दिया गया और युवराज मार्तण्ड सिंह को रीवा राज्य का शासक बनाये जाने की घोषणा की गई। महाराज मार्तण्ड सिंह का राजतिलक बसन्त पंचमी 6 फरवरी 1946 को किला रीवा के राघव महल में हुआ। तदनन्तर 1 अप्रैल 1946 को असिस्टेण्ट गवर्नर जनरल द्वारा उन्हें राज्याधिकार का खरीता प्राप्त हुआ। खरीता दरबार में ही महाराज मार्तण्ड सिंह ने यह घोषणा की कि शासन व्यवस्था में जनता का हाथ रहेगा और उनका निजी व्यय राजकीय बजट से अलग रखा जायेगा। साथ ही सर आल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में रीवा राज्य का संविधान बनाने हेतु एक समिति के निर्माण की घोषणा की गई। परन्तु सर आल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर की सेवायें इस कार्य हेतु उपलब्ध न हो पाई। अतः 25 सितम्बर 1946 के आदेश द्वारा सर हरीसिंह गौड़ की अध्यक्षता में ‘‘संविधान समिति’’ का गठन किया गया।

सर्वश्री इन्द्र बहादुर सिंह, नर्मदा प्रसाद सिंह, पं0 शम्भूनाथ शुक्ल, कप्तान अवधेश प्रताप सिंह, कर्नल शमसुद्दीन, देवीशंकर खण्डेलवाल एवं अवधबिहारी लाल इस समिति के सदस्य तथा श्री आर. कौशलेन्द्र राव एवं श्री राघवेन्द्र प्रसाद क्रमशः सचिव एवं उपसचिव नियुक्त किये गये। इस समिति ने अपना कार्य 2 अक्टूबर 1946 को प्रारंभ कर प्रतिवेदन 26 मई 1947 को रीवा दरबार के समक्ष प्रस्तुत किया। गौड़ समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने पर 7 अगस्त 1947 को महाराज रीवा ने रीवा राज्य के नये संविधान की घोषणा की। यह संविधान संसदात्मक शासन प्रणाली के सिद्धान्तों पर आधारित था। उसमें द्विसदनीय व्यवस्थापिका और महाराज को सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिमण्डल की व्यवस्था थी। संविधान में यह भी कहा गया था कि, प्रधानमंत्री को व्यवस्थापिका के बहुमत का समर्थन प्राप्त होना चाहिए। संविधान के कुछ अन्य प्रावधानों से स्पष्ट है कि उस समय राज्य में इलाकेदारों और पवाईदारों का बहुत प्रभाव था, क्योंकि संविधान में यह कहा गया था कि व्यवस्थापिका के उच्च सदन में 50 प्रतिशत स्थान इलाकेदारों और पवाईदारों के प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार 4 अप्रैल 1948 को बघेलखण्ड और बुन्देलखण्ड की 35 रियासतों को मिलाकर एक नई इकाई ‘‘विन्ध्य प्रदेश’’ के निर्माण की विधिवत घोषणा की गई। रीवा के महाराज मार्तण्ड सिंह विन्ध्य प्रदेश के राज प्रमुख बनाये गये। कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के नेतृत्व में मंत्रिमण्डल का गठन हुआ। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश के अनुसार 1 नवम्बर 1956 को विन्ध्य प्रदेश, भोपाल, महाकौशल एवं मध्य भारत क्षेत्र को मिलाकर वर्तमान मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ।

महाराज मार्तण्ड सिंह द्वारा दुनिया को ‘व्हाइट टाइगर’ का उपहार प्रदान किया गया था। सन् 1951 में उन्होंने सफेद शेर मोहन को पकड़ा था। इसे नाम दिया था मोहन, आज दुनिया मे जितने सफेद बाघ है वह सभी मोहन के वंशज है। यही वजह है कि वाइट टाइगर सफारी मुकुन्दपुर का नाम महाराज मार्तण्ड सिंह जूदेव रखा गया है। पूर्व मंत्री रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ल के अथक प्रयासों से दुनिया की इकलौती व्हाइट टाइगर सफारी मुकुन्दपुर आपको समर्पित की गई है। महाराज मार्तण्ड सिंह शिक्षा तथा खेल के लिए हमेशा समर्पित रहे हैं। क्रिकेट, फुटवाल, हॉकी सहित आखेट उन्हें पसंद था। अपने जीवन काल में वे अहंकार से मुक्त थे तथा उन्होंने न करना तो सीखा ही नहीं था। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी तक से उनके घनिष्ठ संबंध रहे हैं। महाराज मार्तण्ड सिंह कुशल राजनेता भी थे, 3-3 बार जनता ने चुनकर लोकसभा भेजा। महाराज ने कई सड़क, पुल महाराज मार्तण्ड सिंह का वन्य प्राणियों एवं पर्यावरण से विशेष लगाव था। उन्होंने बांधवगढ़ को एक राष्ट्रीय उद्यान बनाने हेतु सन् 1967-68 में भारत सरकार से माँग की थी, उन्होंने बाघ का शिकार बन्द किये जाने की भी अपील की थी। महाराज मार्तण्ड सिंह का स्वर्गवास 20 नवम्बर 1995 को हुआ था।

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