महाराज अनिरुद्ध सिंह को सेंगर राजकुमारी ने मारी थी गोली, रियासत ने शासको से छीना राज्य का बड़ा हिस्सा:

By Tejnews.com 2020-12-07 द बघेली     

रीवा रियासत के महाराज भाव सिंह के कोई नहीं थी। लिहाजा भाव सिंह ने अपने छोटे भाई यशवन्त सिंह के पुत्र अनिरूद्ध सिंह को बान्धव गद्दी पर बैठाया। अनिरूद्ध सिंह बचपन से ही महाराज भाव सिंह के पास रहते थे। लेकिन महाराज अनुरुद्ध सिंह महज 10 वर्ष (सन 1690- 1700) ही रियासत में राज कर सके।

पुत्र के अभाव में उत्तराधिकारी हेतु बादशाह से मंजूरी ले कर महाराज नभव सिंह ने आने अनुज सेमरिया इलाकेदार के कनिष्ठ पुत्र अनिरुद्ध सिंह को गोद ले लिया था। दत्तक पुत्र की स्वीकृति लड़ने के लिए कुछ व्यय करने के साथ ही रिस्तेदारो- सरदारों की भी सहायता लेने पड़ी थी। लहरे भाई को रीवा महाराज द्वारा गोद ले लेने से जेठ भाई राज्य के दुश्मन बन गए थे।

अनिरुद्ध सिंह सेंगरो के राज्य मे दखल देने लगे और राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। गंगेव मे गढ़ी बनाने से पहले सेंगर शासक भनवार (मनिगवा) गढ़ी से राज्य चलाते थे सेंगर ठाकुर रघुराज सिंह गंगाजी के दर्शन के लिए प्रयाग गये हुए थे। इस बात की सूचना पाकर रीवा महाराज अनिरुद्ध सिंह ने भनवार गढ़ी पर हमला बोल दिया और भनवार गढ़ी के पास में ही सेना के साथ पड़ाव डाल लिए और प्रस्ताव भेजा की आत्मसमर्पण कर दें। लेकिन सेंगर रानी ने प्रस्ताव नहीं माना, तब राजा अनिरुद्ध सिंह हाथी पर बैठ कर अपनी सेना के साथ किले पर हमला बोल दिया। भीषण युद्ध आरम्भ हो गया रानी साहब ने बन्दूक़ से महाराज अनिरुद्ध सिंह को मार गिराया महाराज वहीं धराशायी हो गये।
महाराज के मारे जाने की सूचना पाकर बघेल रियासत की बड़ी सेना ने कूच किया और युद्ध मे जीत दर्ज की। रीवा रियासत ने रघुराज सिंह को बंदी बनाया और एक तिहाई राज्य छोड़कर बांकी का हिस्सा बघेल रियासत में शामिल कर लिया था। इस युद्ध के बाद रीवा राजा ब्रिटिश वायसराय के कोर्ट गये। वहाँ से आदेश पारित हुआ और सेंगर ठाकुर गढ़ी को छोड़कर कर गंगेव में गढ़ी बना लिए।

सेंगरो वंश को खत्म करने रीवा रियासत ने उठाया कदम:-
रीवा राजा अनिरूद्ध की मौत के बाद रीवा रियासत के अधीन सभी इलाके एवं पवाईदार लामबन्द हो गये।सेंगरो को लड़की न देने और न लेने का फरमान जारी किया गया ताकि सेंगरो का वंश न बढ़े और बिना युद्ध के ही सेंगर राज को अपने अधिपत्य में कर सके, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सेंगरो की रिश्तेदारी यूपी और बिहार में होने लगी।
सेंगर राजाओ से युद्ध मे वीरगति प्राप्त हुए रीवा रियासत के बघेल महाराज अनिरुद्ध सिंह की मनिगवा मे एक छतुरी बनी है। एक किवदंती यह भी है कि सेंगरी नदी के क़रीब वहा पर पूजा करने जाते थे। वही पर भनवार गढ़ी मे उन्होंने ठाकुर रघुराज सिंह की कन्या को देखा और उनसे विवाह करने की बात की राजकुमारी ने मना कर दिया क्यो की वह बघेलो को आक्रमणकारी लुटेरा मानते थे, जो हमारे राज्य मे घुस आए है। राजकुमारी ने मना किया कि हमारे राज्य मे दखल मत दीजिए ठाकुर रघुराज सिंह कल्पवास मे गए थे अनिरुद्ध सिंह ने राजकुमारी से राक्षस विवाह करना चाहा राजकुमारी ने सुरक्षा मे राजा अनिरुद्ध सिंह को गोली मार दी और महाराज वीर गति को प्राप्त हो गए।

ऐसा कहा जाता है कि राजकुमारी अचूक निशानेबाज थी और उन्होंने काफी दूर स्थित किले सेे महाराज पर निशाना लगाकर गोली मारी थी। आज भी उस घटना स्थल पर मौजूद छतरी युद्ध की गवाही देती है।
एक भी कहा जाता है कि महाराज भाव सिंह के शासन काल मे तत्कालीन रत्नपुर नरेश तखत देव के चचेरे भाई नीलकंठ देव कर्चुली अपने भाई नीलकंठ देव कर्चुली अपने परिवार और साथियों के साथ रीवा आये। उन्हें पश्चिम की ओर 15 किलोमीटर दूर भोलगढ़ गांव रहने के लिए दिया गया। महाराज भाव सिंह के दत्तक पुत्र राजा अनुरुद्ध सिंह - रानी बीनकुंअरि से युवराज अवधूत सिंह पैदा हो चुके थे। अनुरुद्ध सिंह ने ठाकुर रघुनाथ सिंह की कन्या से विवाह के लिए प्रस्ताव भेजा, ठाकुर रघुराज सिंह की गैर मौजूदगी में अपनी सुरक्षा के लिए सेंगर रानी ने बंदूक उठा ली और महाराज अनुरुद्ध पर गोली चला दी, जिसमे अनुरुद्ध सिंह वीर गति को प्राप्त हो गए। उसी स्थल पर छतरी मनिगमा (मनगवां) गढ़ी से बाहर नदी किनारे आज भी खड़ी है। रानी ने राज्य की व्यवस्था तरौहा (कर्वी तहसील बाँदा) के रूद्रासाह के पुत्र ह्रदय राय सुरकी को सौंप कर दुधमुहे शिशु को लेकर मायके प्रतापगढ़ पधार गई।

Similar Post You May Like

  • रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी की स्थापना लेफ्टि. कर्नल सर वेंकटरमण सिंह के शासन काल में हुई थी। महाराज सेना में बहुत अधिक रुचि रखते थे। 27 जुलाई 1904 को उन्होंने स्वयं रीवा स्टेट आर्मी के कमाण्डर इन चीफ का पद ग्रहण किया था। इन्होंने रीवा के अलावा सतना, बघऊँ और बान्धवगढ़ में फौजी छावनियाँ स्थापित की थीं। रिसाला, पलटन और तोपखाना को आधुनिक बनाया। फौजियों के प्रशिक्षण की अद्यतन व्यवस्था की गयी थी। पहल

  • जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    अब तक आपने रीवा स्टेट के बारे में पढा सुना है लेकिन रीवा स्टेट से लगी हुई सेंगर राजपूतों की 'मऊ स्टेट' भी थी जिसके बारे में कम लोगों को ही जानकारी है। यह स्टेट सेंगर राजाओं के अधिपत्य में थी और इस राज्य में कई जागीरे भी शामिल थी। मऊ स्टेट बघेलर स्टेट से पुरानी मानी जाती है। बघेली स्टेट के 34 शासको ने राज्य किया जबकि सेंगर रियासत में 51 से अधिक वंशजों ने रियासत चलाई। सेंगर इकलौती रियासत थी

  • बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    आपको जानकर यह हैरानी होगी कि बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म बघेलखण्ड में हुआ था। इतना ही नही रियासत के महाराज अजीत सिंह नें बादशाह और उसकी मां को प्रश्रय दिया था। गढी में और बादशाह की हिफाजत की। अब इसी इलाके में दुनिया की इकलौती व्हाइट टाइगर सफारी मौजूद है। जी हां हम बात कर रहे है मुकुदपुर की जहां बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म हुआ था। दरअसल जिस समय महाराज अजीत सिंह (सन् 1755-1809) रियासत की गद

  • बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय, व्याघ्रदेव है पितामह

    बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय, व्याघ्रदेव है पितामह

    बघेलखण्ड में ‘‘बघेल राज्य’’ स्थापित होने के पूर्व गुजरात में बघेलों की सार्वभौम्य सत्ता स्थापित हो चुकी थी, जिनकी राजधानी ‘‘अन्हिलवाड़ा’’ थी। बघेल क्षत्रिय चालुक्यों की एक शाखा है, जिन्होंने दक्षिण भारत के चालुक्य क्षत्रियों की एक शाखा के रूप में गुजरात पहुँचकर 960ई. में अन्हिलवाड़ा में सोलंकियों का राज्य स्थापित किया था। रीवा स्टेट गजेटियर में भी यह उल्लेख किया गया है कि, बघेलखण

  • आदिशक्ति माॅ भरजुना, करती है भक्तों का बेडापार:

    आदिशक्ति माॅ भरजुना, करती है भक्तों का बेडापार:

    सतना जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर माँ भवानी का ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है। यहां माॅ आदिशक्ति विराजमान है यह अपने भक्तों का बेडापार करती है, सर्व मनोकामना पूरी करती है और बिगडे काम को बनाती है। मान्यता है यहां आने वाले कभी भी निराश होकर नही लौटते। इसी आस्था और विश्वास के साथ हजारों भक्त माॅ भरहुना के मंदिर में माथा टेकते है। माॅ भरजुना दुर्गा मंदिर निर्माण के बारे में बताया जात

  • महाराजा रघुराज सिंह की महारानी जिनके इनके शरणागत को प्राप्त था अभयदान:

    महाराजा रघुराज सिंह की महारानी जिनके इनके शरणागत को प्राप्त था अभयदान:

    यूं तो रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह के बारह विवाह हुये थे। लेकिन इन सबमे एक ऐसी महारानी बडी ही स्वाभिमानिनी थीं। इनकी डयौढी में शरणाश्रिय अपराधी से अपराधी व्यक्ति को क्षमादान के लिए महाराज रघुराज सिंह प्रतिज्ञाबद्ध थे। इतना ही नहीं इनकी डयौढी के सामने से सिर खोलकर चलना, छाता लगाना आदि प्रतिबंधित थे। आइये जानते हैं महाराज रघुराज सिंह की प्रमुख महारानी रनावट साहिबा के बारें

  • जन-जागति में मैहर और विजय राघवगढ राजघराने हुये थे तबाह:

    जन-जागति में मैहर और विजय राघवगढ राजघराने हुये थे तबाह:

    मैहर के राजा रघुवीर सिंह 1909-1965 इस समय अल्प व्यस्क थे। इनके संबंधियों और कर्मचारियों ने स्वतंत्रता संग्राम में विशेष रूप से भाग लिया। मैहर राज घराने के विजय राघवगढ के ठाकुर सरजूप्रसाद इस जन जागति के प्रधान थे। इनके नेतत्व में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने अच्छा संगठन किया। इतना ही नही इन लोागों ने दक्षिण की बडी सडक का पूर्ण अवरोध कर दिया और युद्ध की तैयारी में संलग्न हो गये। मै

  • आशु कवि थे महाराज रघुराज सिंह जू देव:

    आशु कवि थे महाराज रघुराज सिंह जू देव:

    रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह परम वैष्णव भक्त तथा उच्च कोटि के साहित्य सेवी थे। उनके दरवार में कवियों का विशेष मान था। वे स्वयं भी अच्छी कविता करते थे। उनकी रचनाओं का मुख्य विषय था भगवदभक्ति। कवि के रूप में उनका एक विशेष गुण था- आशु रचना अर्थात बिना पहले से तैयारी किये हुये तुरंत कविता बनाने लग जाना। एक समय की बात है जब आप रीवा के प्रसिद्ध मन्दिर लक्ष्मणबाग में निवास कर रहे थे, ए

  • जनिये आखिर कैसे मिली थी तिवारियो को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी:-

    जनिये आखिर कैसे मिली थी तिवारियो को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी:-

    बघेलखण्ड में बघेल रियासत का कीर्तिमान स्थापित करने में तिवारियों का अहम स्थान रहा है। बघेल रियासत के अभ्यूदय और विकास के साथ ही रीवा राज्य के तिवारी "अधरजिया तिवारी" कहलाने लगे थे। तिवारी से "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिलने के पीछे सौर्य एवं पराक्रम की गाथा जुडी हुई है। इसी से प्रभावित होकर बघेलों के आदिपुरूष ने तिवारियों को "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिली थी। इसलिए यह जानना जरूरी है क

  • महाराज मार्तण्ड सिंह नें दिलाई थी दुनिया को व्हाइट टाइगर की पहचान:

    महाराज मार्तण्ड सिंह नें दिलाई थी दुनिया को व्हाइट टाइगर की पहचान:

    बघेल रियासत के 34वें महाराज के महाराज मार्तण्ड सिंह के नाम कई बडी उपलब्धियां रही। राजतंत्र लेकर प्रजातंत्र तक में मार्तण्ड सिंह नें अपनी अनूठी छाप छोडी है। महाराज मार्तण्ड नें दुनिया को जहां व्हाइट टाइगर की पहचान कराई वहीं रिमाही जनता को आजादी के पहली ही 1946 में राजतंत्र से आजाद कर दिया था। गोविन्दगढ़ किला के दरिया महल में 15 मार्च 1923 को मार्तण्ड सिंह का जन्म हुआ था। जब यह समाचार रिमह

ताज़ा खबर

Popular Lnks