आदम्य वीर थे बुन्देल-केसरी छत्रसाल:

By Tejnews.com 2020-12-06 द बघेली     

देश की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के लिए मर-मिटने वाले वीरों में बुन्देला वीर छत्रसाल का नाम आदर से लिया जाता है। वे पन्ना नरेश महाराजा चम्पतराय के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही उन्होंने क्षत्रियोचित सभी गुण अपना लिये थे। बुन्देलखण्ड की पावन वसुंधरा के महाराणा प्रताप की भांति उन्होंने सब सुखों को त्याग कर अदम्य वीरता का परिचय दिया। इसीलिए ये बुन्देलखण्ड के राणाप्रताप कहे जाते है। भारतीय वीरों का सदा से यह बाना रहा है कि वे शरणागत की रक्षा अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं, भले ही शरण में आया हुआ प्राणी उनके खून का प्यासा क्यों न हो।
महाराजा छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1707 विक्रमी तदनुसार दिनांक 1641 ईस्वी को वर्तमान टीकमगढ जिले के एक पहाड़ी ग्राम में हुआ था। इस बहादुर वीर बालक की माताजी का नाम लालकुंवरि था और पिता का नाम था चम्पतराय। चम्पतराय बड़े वीर और बहादुर व्यक्ति थे।
10 वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। 16 साल की अवस्था में छत्रसाल को अपने माता.पिता की छत्रछाया से वंचित होना पड़ा। इस अवस्था तक छत्रसाल की जागीर छिन चुकी थी। फिर भी छत्रसाल ने धैर्यपूर्वक और समझदारी से काम लिया। एक समय ऐसा भी आया जब दिल्ली तख्त पर विराजमान औरंगजेब को हरा कर बुन्देलखण्ड में छत्रसाल ने साम्राज्य खडा किया। बुंदेलखंड के बड़े साहसी व बहादुर सैनिक प्राण.प्रण से युद्ध में अपना कौशल दिखाने के कारण सदैव विजयी रहे। छत्रसाल ने धीरे-धीरे अपनी प्रजा को सब प्रकार की सुख-सुविधाएं पहुंचा कर प्रजा का विश्वास प्राप्त कर लिया था।
छत्रसाल तलवार के धनी थे और कुशल शस्त्र संचालक थे। अपनी सभा में विद्वानों को सम्मानित करते थे। स्वयं भी विद्वान थे तथा कवि थे। शांतिकाल में कविता करना छत्रसाल का कार्य रहा है। भूषण कविराज शिवाजी के दरबार में रहते हुए छत्रसाल की वीरता और बहादुरी की प्रशंसा में अनेक कविताएं कविराज भूषण ने लिखीं। छत्रसाल धार्मिक स्वभाव के थे। युद्धभूमि में व शांतिकाल में दैनिक पूजा-अर्चना करना छत्रसाल का कार्य रहा।
एक समय की बात है, महाराजा छत्रसाल जंगल में एक वक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे। इनके शत्रु इनके प्राणों के ग्राहक होकर भूखे भेडिये की तरह इनके पीछे पडे थे। बादशाह औरंगजेब भी इन्हें दबाने के लिए कई बार प्रयत्न कर चुका था।
जिस समय महाराज वक्ष के नीचे एकाकी सो रहे थे, उसी समय दिलावरखाॅं वहां से निकला। वह उनका जानी दुश्मन था ही। ऐसा अवसर पाकर भी वह क्यों चूकता। उसने अपनी तलवार निकाली और घातक वार करने वाला ही था कि दैवयोग से महाराज की आंख खुल गई। उन्होंन अपूर्व कौशल से अपने आप को बचाया और वे उसे मारने ही वाले थे कि वह उनके चरणों पर गिर पडा तथा गिडगिडा कर जीवन की भिक्षा मांगने लगा। दयालु महाराज ने धोखे से प्राण लेने वाले उस शत्रु को भी जीवन-दान दिया। महाराज छत्रसाल, धन्य है आप की यह उदारता और शरणागत-रक्षा!
छत्रसाल की इस प्रकार की उदारता, दयालुता तथा वीरता के कितने ही उदाहरण पाये जाते हैं। इसीलिए अने कवियों ने मुक्तकंठ से उनकी गुणावली का गान किया है- महाकवि भूषण लिखा है
रैया राय चंपति को चढो छत्रसाल सिंह,
भूषण भनत समसेर जोभ जमकैं।
भादौं की घटा सी उठीं गरदैं गगन घेरैं,
सेलैं सम सेरैं फेरैं दामिनी सी दमकैं।
खान उमराव के आन राजा-रावन के,
सुनि-सुनि उर लागैं घन कैसी धमकैं।
बैगर बगारन की आरि के अगारन की,
नांचती पगारन नगारन की धमकैं।
बुंदेलखंड का शक्तिशाली राज्य छत्रसाल ने ही बनाया था। छतरपुर नगर छत्रसाल का बसाया हुआ नगर है। छत्रसाल की राजधानी महोबा थी। इस वीर योद्धा बहादुर छत्रसाल की 83 वर्ष की अवस्था में 14 दिसंबर 1731 ईस्वी को इहलीला समाप्त हुई। छत्रसाल के पुत्रों ने पन्ना, जैतपुर, अजयगढ़, बिजवार, चरखरी, छतरपुर और जासो का आपस में बंटवारा कर लिया।

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