महाराज रामचन्द्र के दो रत्न तानसेन-बीरबल:

By Tejnews.com 2020-12-06 द बघेली     

रीवा रियासत के महाराज रामचन्द्र (सन् 1555-1592) - महाराज वीरभानु के पश्चात् उनके पुत्र युवराज रामचन्द्र बान्धव गद्दी पर बैठे। युवराज रामचन्द्र का जन्म सन् 1520 में हुआ था। रामचन्द्र का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया था। इनकी शिक्षा-दीक्षा तत्कालीन मन्त्री गणेश राउत के निर्देशन में हुई थी। उन्हे्रं धनुर्विद्या का प्रशिक्षण भी इन्हीं से प्राप्त हुआ था। इन्होंने संगीत की भी साधना की थी। रामचन्द्र का विवाह गौर देश के नरेश कीर्तिसिंह की पौत्री तथा माधव सिंह की पुत्री यशोदा के साथ हुआ था। विवाह के पश्चात् ही महाराज वीरभानु ने सन् 1552 में रामचन्द्र को युवराज पद पर आसीन कर दिया था।

गद्दी पर बैठते ही महाराज रामचन्द्र को इब्राहिम शाह सूर के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में महाराज रामचन्द्र विजयी हुए और इब्राहिम शाह सूर को कैद कर लिया गया। किन्तु महाराज रामचन्द्र ने उनको अपने दरबार में आदर सहित सम्मान देते हुए रखा और उनकी इच्छानुसार उन्हें ससम्मान विदा कर दिया। महाराज रामचन्द्र सम्राट अकबर के समकालीन थे। महाराज रामचन्द्र ने कालिन्जर का दुर्ग शेरशाह सूरी के दामाद अली खाँ से, जो वहाँ का किलेदार था, बहुत बड़ी राशि देकर खरीद लिया था। सन् 1564 में ‘कड़ा’ का गवर्नर गाजी खाँ तन्नौरी महाराज रामचन्द्र की शरण में आया।

सन् 1564-65 में सम्राट अकबर ने अपने खास सरदार जलाल खाँ कुर्ची को बान्धव नरेश रामचन्द्र के पास भेजकर सुप्रसिद्ध गायक तानसेन की माँग की। महाराज रामचन्द्र की इच्छा न होते हुए भी बीरबल के समझाने पर तानसेन को सम्राट अकबर के दरबार में भेजा गया। कहा यह जाता है कि बीरबल इसी धरती की देन हैं, उनका जन्म ‘‘गोधरा’’ (जिला सीधी) में हुआ था। लोकमान्यता है कि बीरबल को गोधरा की देवी का वरदान प्राप्त था।
विन्ध्यांचल की पवित्र धरती के यह दो रत्न - तानसेन तथा बीरबल सम्राट अकबर के नौ रत्नों में प्रमुख थे। तानसेन का जन्म ग्वालियर जिले में हुआ था लेकिन उनकी कर्मभूमि रीवा रियासत थी। तानसेन महाराजा रामचन्द्र के दरबारी गायक थे, उनकी गायकी का लोहा दुनिया मानती थी, तानसेन की लोकप्रियता दिनो दिन बढती गई और दिल्ली दरबार ने तानसेन की मांग कर दी। बताया जाता है कि महाराज तानसेन का किसी भी हालत में रियासत से जाने नही देना चाहते थे लेकिन तानेसन और बीरबल के आग्रह पर उन्होने हांमी भरी थी। इतना ही नही तानसेन को पालकी में कंधा देकर विदा भी किया था। महाराज रामचन्द्र से खुश होकर अकबर ने दोस्ती का हांथ बढाया था और बदले में रियासत को तोप भेंट की थी।

सन् 1592 में महाराज रामचन्द्र के स्वर्गवास के पश्चात् युवराज वीरभद्र बान्धवगढ़ के शासक हुए।

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