जानिए कैसे "रीमाँ" बदलकर बन गया "रीवा"

By Tejnews.com 2020-12-06 द बघेली     

विन्ध्य प्रदेश की राजधानी का गौरव हासिल कर चुके रीवा का नामकरण नर्मदा नदी के नाम रेवा (REWA) से पडा है। असल में रीमाँ से बना रीवा, "रीमाँ" हजारों वर्ष पुराना रीवा का नाम है। इसका उल्लेख दसवी सदी में मिलता है इसके अलावा लोकगीतों में बार-बार जिक्र होता है। दादर, फगुआ, नैकहाई बिरहा गीत में "रीमाँ" बड़े आदर के साथ आता है।
एक समय वह भी आया जब रीमाँ बदल के हो गया था रीवाँ। ईस्वी सन 1871 में यहां ब्रिटिश इण्डिया की बघेलखण्ड एजेन्सी कायम हुई और प्रचलित हो गया बघेलखण्ड। इसके बाद रीमाँ की राज्य भाषा रिमँही कहलाने लगी बधेली। ईस्वी सन 1875 में महाराजा रघुराज सिंह से पोलेटिकल एजेन्सी ने प्रशासन का अधिकार अपने अपने हाँथों ले लिया था। इसके बाद महाराज ने घोषणा कर दी कि अब दफ्तर का काम-काज रिमँही मे न होकर फारसी में होगा। फारसी में मकार हो जाता है बकार। रीमाँ बदल केेे लिखा जाने लगा रीवाँ। जो कि 20वी सदी के मध्यकाल, राज्य विलीनीकरण तक चलन मे रहा है। ईस्वी सन 1919 में दीवान जीतन सिंह के रीवाँ राज्य दर्पण छपा और उस काल के चलन अनुरूप उसमें रीवाँ का प्रयोग देखने को मिलता है। सन 1940 में डा धीरेन्द्र वर्मा के हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा गया उसमें भी रीवाँ का प्रयोग हुआ है। नामीगिनामी साहित्यकार डा धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास गुनाहों का देवता मे ये वाक्य बखूबी देखा जा सकता है मुझे जरा रीवाँ तक बहुत जरूरी काम से जाना है।

यह वही काल रहा जब हमारे पीढ़ी के लोग जो अस्सी-व्यासी बसंत देखे हैं। रीवाँ मे स्कूली छात्र रहें लिखा करते थे रीवाँ। राज्य के अहम पोलेटिकल डिपार्टमेन्ट मे सब काम अँगरेजी में हुआ करता था। जिसका सम्बद्ध ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट से रहा है। यहां रीवाँ इंग्लिस लेटर्स में लिखा जाता रहा रेवा (REWA)। रीवाँ के "व" के ऊपर चन्द्र बिन्दु जिस तरह चन्द्रमा घटते-घटते लुप्त हो जाता है उसी तरह लुप्त हो गया और चल पडा रीवा।

रेवा से रीवा नामकरण वाली किंवदंती मे सोचने-समझने वाली बात यह है कि बघेलराजा बिक्रमादित्य बीहर-बिछिया नदी संगम तट पर नगर बसा कर इनको नजरअंदाज करके नर्मदा नदी को क्यों चुना। दबी जुबान से निकली बात सामने आई ये कि तीन सौ किलो मीटर दूर नर्मदा नदी पवित्र सलिला है और राजा विक्रमादित्य के राज्य में प्रवाहित होती है। दूसरी किंवदंती है कि बादशाह अकबर बाँधौगढ़ छीनकर दुर्योधन को दे दिये थे। बाद मे संबत 1661 मे बादशाह जहाँगीर राजा विक्रमादित्य को 18 परगनन का रीमाँ-मुकुन्दपुर जागीर बक्से थे। बाँधैगढ़ एकोत्रा का जुमला इसका गवाह है।

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