जानिये बघेलखण्ड कि राजभाषा रिमॅंही कैसे फारसी और अग्रेजी में बदली:

By Tejnews.com 2020-12-06 द बघेली     

सन 1857 के स्वतंत्रा संग्राम का समन कर एचईआईसी टूटकर ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट बनी। जिसकी राजधानी तत्कालीन कलकत्ता थी। भारत देश इण्डिया ग्रेटब्रिटेन का उपनिवेश हो गया। इसी वर्ष ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट की रीमाँ में एक एजेन्सी कायम होकर सन 1858 में नामबदल कर बन गयी सेन्ट्रल इण्डिया एजेन्सी और सन 1862 में स्थानान्तरित सतना हो गई थी। जहाँ सन 1867-68 से रेलगाडियाँ आने जानेे लगी थीं। सन 1870 में बुँदेलखण्ड की तर्ज पर बघेलखण्ड शब्द प्रचलन में आ गया।

ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट ने महाराजा रघुराज सिंह को उनके सहयोग के उपलक्ष्य में उपाधि और दो तोप फायर बहाल के अलावा सन 1859 में वर्तमान शहडोल का भूभाग वापस कर दिया था। महाराजा रघुराज सिंह की फिजूल खर्ची इतनी बढ़ी हुई थी कि राजकोष खाली हो गया था और राज्य ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेंट का दस लाख रूपये का कर्जदार हो गया। सन 1875 में ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट की पोलेटिक एजेन्सी नेे अपने हाथों राज्य का प्रबन्ध ले लिया। इसी बीच महाराजा रघुराज सिंह के सन 1880 में परलोक सिधारने पर इनके वारिस चार वर्षीय ब्यंकट रमण सिंह को ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट ने महाराजा घोषित करके अपने संरक्षण में ले लिया और वयस्क होने पर सन 1895 में प्रशासन सौंपा। इन बीस वर्षों के अंतराल में ब्रिटिश पोलेटिकल एजेन्सी ने ना केवल कर्ज पटाया बल्कि राज्य का कायापलट भी किया। किन्तु सदियों से चली आ रही राजभाषा रिमँही को हटाकर फारसी को बैठा दिया गया।
मुगुल काल से चली आ रही दफ्तरी भाषा फारसी को अँगरेजों ने यथावत अपनाये रखा था। किन्तु पोलेटिकल डिपार्टमेन्ट् में सब काम अँगरेजी में हुआ करता था। ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट ने जब रीमाँ राज्य का प्रशासन अपने हाथो लिया तो यहाँ भी वही सब नियम लागू हो गये। तब सब से बड़ा बदलाव यह आया कि रीमाँ नाम परिवर्तित होकर फारसी मे रीवाँ और अँगरेजी में REWA लिखा-बोला जाने लगा। सदियों से चले आ रहे राजकीय विभाग अब महकमा और डिपार्टमेन्ट बन गये। पुराने अधिकारियो का नाम बदलकर हाकिम और आफीसर कर दिया गया। राज्य और राजधानी का नाम रीवाँ हो चला था। बहरहाल इस राज्य के लिये उन्नीसवीे सदी के पचहत्तरवें वर्ष से जो प्रगति पथ बना वह प्रशस्त होता गया। कचहरी बनी, जेल का निर्माण हुआ, सिविल लाइन बनी और कमसेरियेट इत्यादि स्थापित हुये।

सन 1895 में महाराजा व्यंकट रमण सिंह के बालिग होने पर एजेन्सी ने इन्हे प्रशासन सौंप दिया। एजेन्सी के बनाये गये प्रगति पथ को इन्होने आगे बढा़या। बीसवीं सदी कि शुरूआत में ही कई उल्लेखनीय काम हुये। पहला महाराजा व्यंकट रमण सिंह ने आदेश प्रसारित किया कि दफ्तरों का काम देवनागरी लिपि में हों। फारसी वालों ने देवनागरी लिपि सीखी। दूसरा डाक्टर ग्रिअर्सन ने भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण किया। उन्होने सदियों पूर्व से चले आ रहे राज्य की बोली रिमँही का नाम नये शब्द बघेलखण्ड को मान्यता देते हुये बदल कर कर दिया बघेलखण्डी। उनकी रपट लिंंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया में बघेलखण्डी दर्ज है जो घिसटते-घिसटते अब बन गयी है मात्र तीन अक्षरों की बघेली। बोली होते हुये भी इसेे अघोषित भाषा मान कर हर विधा का साहित्य रचा जा रहा है।

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