महाराज गुलाब सिंह को भी कत्ल के आरोप में होना पडा था राज्य के बाहर:

By Tejnews.com 2020-12-06 द बघेली     

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि जिस महाराज के शान में कोई कमी नही थी और देश दुनिया में मान सम्मान था। ऐसे महाराज को आपने की राज्य से बाहर होना पडा। जीं हा हम बात कर रहे है रीवा रियासत के महाराज गुलाब सिंह की जिन्हे कत्ल के सहयोगी होने के आरोप पर राज्य के बाहर रहने का आदेश दिया गया था। महाराज को यह फरमान कोई राजा महाराजा ने नही बल्कि अंग्रेजी हुकमरानों ने दिया था।
रीवा रियासत के तत्कालीन महाराज व्यंकट रमण सिंह का सन 1918 में निधन हो गया था उस समय महाराज कुमार गुलाब सिंह इन्दौर में शिक्षारत थे। रीवा बुलाकर 'असिसटैण्ट गवर्नर जनरल' ने उन्हे महाराजा घोषित किया। उनके नाबालिग होने के कारण ’रीजेन्सी’ कायम कर के राजा के मामा रतलाम नरेश सज्जन सिंह को ’रीजेन्ट’ नियुक्त कर दिया गया। महाराजा गुलाब सिंह बालिग हुये तो 31 अक्टूबर सन 1923 को 'ब्रिटिश इण्डिया' के 'वायसराय ऐण्ड गवर्नर जनरल लार्ड रीडिंग' ने इन्दौर में उन्हे रीवा स्टेट का प्रशासनिक अधिकार बहाल कर दिया। इनका प्रशासन बहुत-चुस्त दुरुस्त और प्रगतिशील रहा। आवागवन के साधनो विस्तार, शिक्षा संस्थानो की स्थापना, राज्य में लोकल सेल्फ गवर्नमेन्ट घोषित करने का उल्लेखनीय कार्य महाराज गुलाब सिंह ने किया। महाराजा गुलाब सिंह अचानक ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट के कोप भाजन बन बैठे थे यह जानने के लिए आइयें चलते है अतीत में। जब देश में सम्पूर्ण स्वराज्य के लिए अंतिम लडाई लडी जा रही थी, स्वतंत्रता संग्राम, भारत छोड़ो आँदोलन, करो या मरो आंदोलन, असहयोग आंदोलन तथा अगस्त क्राँति से अभिहित किया जाता है। सन 1942 में भारत ने सम्पूर्ण स्वराज्य के सिधान्त का आधार लेकर स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई लडी। जिसे स्वतंत्रता संग्राम, भारत छोड़ो आँदोलन, करो या मरो आंदोलन, असहयोग आंदोलन तथा अगस्त क्राँति से अभिहित किया जाता है। महात्मा गाँधी ने आंदोलन का आगाज करते हुए ललकारा था अँगरेजो भारत छोड़ो और देशवसियो को करो या मरो। गिरफ्तारी का सिलसिला रीवा में भी उसी दिन से जारी हुआ। 9 अगस्त को लाल मर्दन सिंह और राजमणि प्रसाद गिरफ्तार कर लिए गए। 10 अगस्त को जानकी पार्क में रीवा दिवस मनाया गया।
महाराज गुलाब सिंह ने महात्मा गांधी के कार्यक्रमों को अपने राज्य में लागू किया। गोपनीयतौर पर क्रांतिकारियो की खूब मदद करते थे इसी वजह से अंग्रेजों के कोपभाजन हुए। महाराजा राजा गुलाब सिंह को एक कत्ल में सहयोगी होने के अपराध में मुअत्तिल करके राज्य सेे बाहर रहने का आदेश हुआ था और ‘ब्रिटिश गवर्नमेंन्ट आफ इण्डिया’ के अधिकारी मेजर उल्ड्रिज को रीवा स्टेट का ‘एडमिनिस्ट्रेटर’ नियुक्त कर दिया गया था। ब्रिटिश सरकार ने उनके ऊपर मुकदमा चलाया और 1942 से 1946 के बीच उन्हें अपमानित करने की चेष्टा की। महाराज को वापस लाने के लिए आँदोलन किया जा रहा था, जिसकी शुरुआत 18 फरवरी 1942 को हुई थी। वरिष्ट कांग्रेसी नेताओं सहित सैकड़ो अन्य लोग महाराज की गिरफ्तारी के विरोध में सेन्ट्रल जेल रीवा और अन्य कस्बों के हवालातों में बंद थे। जिन्हे उसी ‘डिफेन्स रूल आफ इण्डिया’ के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिस ‘ऐक्ट’ के तहत अगस्त क्राँति के क्राँतिकारियों को किया जा रहा था। यह महाराज गुलाब सिंह का आत्मबल व सत्याग्रह की भावना थी कि उनके ऊपर ब्रिटिश सरकार कोई आरोप सिद्ध न कर पाई और महाराजा वापस आये पुनः शासन सम्हाला।
महाराज गुलाब सिंह ने अपने शासन के अंतिम 4 वर्ष ब्रिटिश सरकार से जूझते हुए 30 जनवरी 1946 तक सेन्ट्रल इण्डिया एजेन्सी की सबसे बड़ी रियासत रीवा के शासक रहे। फलस्वरूप 31 जनवरी सन 1946 को इनसे प्रशासनिक अधिकार छीन कर महाराज कुमार मार्तण्ड सिंह को सौंप कर राजा कोे राज्य छोड़ कर अन्यत्र चले जाने का आदेश प्रसारित कर दिया। तदानुसार 6 फरवरी सन 1946 को राजा मार्तण्ड सिंह रीवा राजगद्दी पर बिराजे, उनका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। महाराज गुलाब सिंह इसके पश्चात् रीवा की उन गलियों को छोड़कर, जहाँ की दीवालें उनके नारों ‘‘पढ़िये-पढ़ाइये’’, ‘‘रिमहाई गजी (देशी खद्दर) घर-घर में सजी’’ से भरी हुई थी, मुम्बई चले गये। अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में उन्होंने हमेशा रीवा के बुने हुए सूत का वस्त्र पहना। साफा, परदनी और छकलिया उनकी पोषाक थी। 15 अगस्त सन 1947 को देश भारत स्वतंत्र हुआ और एक वर्ष के अंतराल में देश के 40 प्रतिशत भूभाग में काबिज रियासते भारत संघ का अंग बन गयीं। राजतंत्र का अंत हो गया। इस तरह रीवा, रिमहों को देकर महाराज गुलाब सिंह 13 अप्रैल 1950 को इस संसार सागर से महाप्रयाण कर गये।

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