रीमाँ राज्य का छिना लिया था भोंसले राजा ने दक्षिणी भूभाग, राजकोष में बचे थे मात्र दो हांथी दांत:

By Tejnews.com 2020-12-05 द बघेली     

संधि तोड़ कर सन 1808 में नागपुर के भोंसले राजा ने रीमाँ राज्य के दक्षिणी भूभाग पर कब्जा कर लिया था। यही भूभाग वर्तमान में मध्यप्रदेश का शहडोल संभाग बन गया है। इस भूभाग का उपभोग भोंसले राजा ज्यादा दिनों तक नहीं कर पाये। आनरेबल ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ हुये युद्ध में 17 नवंबर 1817 को भोसले राजा की पराजय हुई। नागपुर राज्य कम्पनी के स्वामित्व में आ गया। तब स्वमेव रीमाँ राज्य का वह भूभाग अँग्रेजों के स्वामित्व में आ गया था।
सन 1809 में महाराजा अजीत सिंह का बैकुण्ठवास हो गया और बाबू जय सिंह महाराजा बन कर रीमाँ की राजगद्दी पर बिराजे। उस काल में राज्य कोष में मात्र हाथी दाँत के दो टुकड़े बचे पड़े हुये थे। आनरेबल ईस्ट इण्डिया कंपनी के चपेट में इन्होने एक बार अक्टूवर सन 1812 और दुबारा 5 जून सन 1813 में संधि कर ली जो अभिलेख में दर्ज हुई। साहित्य में मन रमाने वाले महाराजा जय सिंह ने सन 1820 में राज-काज बाबू साहब विश्वनाथ सिंह को सौंप दिया। ये कुशल प्रशासनिक सिद्ध हुये, राज्य को प्रगति पथ पर लाकर माली हालत भी सुधारी और पाँच पीढियों के बाद रजकीय सेना भी इन्होने ही गठित की थी। कहा तो यह जाता है कि सेना का गठन इस मन्तव्य से किया गया था कि आनरेबल ईस्ट इण्डिया कंपनी से लड़कर अपने राज्य का दक्षिणी बडा भूभाग छीन लेगें। क्यों कि संधि हो जाने के बाद भी बार बार माँग करने पर कम्पनी हीला-हवाला करती आ रही थी। किन्तु राजा विश्वनाथ सिंह कम्पनी से पंगा लेने की हिम्मत न कर सके। सेना बिना काम के सफेद हाथी साबित हो रही थी। अतः उसका उपयोग सरहदी छोटे राज्यों और जागीरदारों को आधीनता स्वीकार कराने के लिये उपयोग में लाया गया। इस सेना ने राजकीय नादेहन्द इलाकेदारों और पवाईदारों पर भी दवाब बनाया। कई के आधे चैथाई भूभाग छीन कर खालसे में शामिल कर लिये गये। कडाई से राजस्व वसूली होने लगी फलतः राजकोष लबालब हो चला था।
महाराजा विश्वनाथ सिंह भी पिताश्री की भाँति ही महान साहित्यकार रहे हैं, हिन्दी भाषा का प्रथम नाटक आनन्द रघुनन्दन इन्ही की देन है। सन 1833 में बाबू विश्वनाथ सिंह महाराजा बनकर राजगद्दी पर बिराजे जिनका स्वर्गवास सन 1854 में हुआ। महाराज कुमार रघुराज सिंह ने बहैसियत राजाय राजसत्ता सँभाली। ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेन्ट ने महाराजा रघुराज सिंह को उनके सहयोग के उपलक्ष में उपाधि दी और दो तोप फायर बहाल के अतिरिक्त सन 1859 में वापस कर दिया वर्तमान शहडोल का सम्पूर्ण भूभाग, जिस पर भोंसले राजा ने कब्जा किया था।

Similar Post You May Like

  • रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी जिसके लेफ्टि. कर्नल थे महाराज सर वेंकटरमण सिंह:

    रीवा स्टेट आर्मी की स्थापना लेफ्टि. कर्नल सर वेंकटरमण सिंह के शासन काल में हुई थी। महाराज सेना में बहुत अधिक रुचि रखते थे। 27 जुलाई 1904 को उन्होंने स्वयं रीवा स्टेट आर्मी के कमाण्डर इन चीफ का पद ग्रहण किया था। इन्होंने रीवा के अलावा सतना, बघऊँ और बान्धवगढ़ में फौजी छावनियाँ स्थापित की थीं। रिसाला, पलटन और तोपखाना को आधुनिक बनाया। फौजियों के प्रशिक्षण की अद्यतन व्यवस्था की गयी थी। पहल

  • जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    जानिये सेंगर राज्य के अतीत की दास्ता, 'मऊ स्टेट' कैसे बन गया मऊगंज:

    अब तक आपने रीवा स्टेट के बारे में पढा सुना है लेकिन रीवा स्टेट से लगी हुई सेंगर राजपूतों की 'मऊ स्टेट' भी थी जिसके बारे में कम लोगों को ही जानकारी है। यह स्टेट सेंगर राजाओं के अधिपत्य में थी और इस राज्य में कई जागीरे भी शामिल थी। मऊ स्टेट बघेलर स्टेट से पुरानी मानी जाती है। बघेली स्टेट के 34 शासको ने राज्य किया जबकि सेंगर रियासत में 51 से अधिक वंशजों ने रियासत चलाई। सेंगर इकलौती रियासत थी

  • बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    बघेलखण्ड में जन्मा था मुगल वंश का बादशाह अकबार:

    आपको जानकर यह हैरानी होगी कि बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म बघेलखण्ड में हुआ था। इतना ही नही रियासत के महाराज अजीत सिंह नें बादशाह और उसकी मां को प्रश्रय दिया था। गढी में और बादशाह की हिफाजत की। अब इसी इलाके में दुनिया की इकलौती व्हाइट टाइगर सफारी मौजूद है। जी हां हम बात कर रहे है मुकुदपुर की जहां बादशाह अकबर द्वितीय का जन्म हुआ था। दरअसल जिस समय महाराज अजीत सिंह (सन् 1755-1809) रियासत की गद

  • बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय, व्याघ्रदेव है पितामह

    बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय, व्याघ्रदेव है पितामह

    बघेलखण्ड में ‘‘बघेल राज्य’’ स्थापित होने के पूर्व गुजरात में बघेलों की सार्वभौम्य सत्ता स्थापित हो चुकी थी, जिनकी राजधानी ‘‘अन्हिलवाड़ा’’ थी। बघेल क्षत्रिय चालुक्यों की एक शाखा है, जिन्होंने दक्षिण भारत के चालुक्य क्षत्रियों की एक शाखा के रूप में गुजरात पहुँचकर 960ई. में अन्हिलवाड़ा में सोलंकियों का राज्य स्थापित किया था। रीवा स्टेट गजेटियर में भी यह उल्लेख किया गया है कि, बघेलखण

  • आदिशक्ति माॅ भरजुना, करती है भक्तों का बेडापार:

    आदिशक्ति माॅ भरजुना, करती है भक्तों का बेडापार:

    सतना जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर माँ भवानी का ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है। यहां माॅ आदिशक्ति विराजमान है यह अपने भक्तों का बेडापार करती है, सर्व मनोकामना पूरी करती है और बिगडे काम को बनाती है। मान्यता है यहां आने वाले कभी भी निराश होकर नही लौटते। इसी आस्था और विश्वास के साथ हजारों भक्त माॅ भरहुना के मंदिर में माथा टेकते है। माॅ भरजुना दुर्गा मंदिर निर्माण के बारे में बताया जात

  • महाराजा रघुराज सिंह की महारानी जिनके इनके शरणागत को प्राप्त था अभयदान:

    महाराजा रघुराज सिंह की महारानी जिनके इनके शरणागत को प्राप्त था अभयदान:

    यूं तो रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह के बारह विवाह हुये थे। लेकिन इन सबमे एक ऐसी महारानी बडी ही स्वाभिमानिनी थीं। इनकी डयौढी में शरणाश्रिय अपराधी से अपराधी व्यक्ति को क्षमादान के लिए महाराज रघुराज सिंह प्रतिज्ञाबद्ध थे। इतना ही नहीं इनकी डयौढी के सामने से सिर खोलकर चलना, छाता लगाना आदि प्रतिबंधित थे। आइये जानते हैं महाराज रघुराज सिंह की प्रमुख महारानी रनावट साहिबा के बारें

  • जन-जागति में मैहर और विजय राघवगढ राजघराने हुये थे तबाह:

    जन-जागति में मैहर और विजय राघवगढ राजघराने हुये थे तबाह:

    मैहर के राजा रघुवीर सिंह 1909-1965 इस समय अल्प व्यस्क थे। इनके संबंधियों और कर्मचारियों ने स्वतंत्रता संग्राम में विशेष रूप से भाग लिया। मैहर राज घराने के विजय राघवगढ के ठाकुर सरजूप्रसाद इस जन जागति के प्रधान थे। इनके नेतत्व में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने अच्छा संगठन किया। इतना ही नही इन लोागों ने दक्षिण की बडी सडक का पूर्ण अवरोध कर दिया और युद्ध की तैयारी में संलग्न हो गये। मै

  • आशु कवि थे महाराज रघुराज सिंह जू देव:

    आशु कवि थे महाराज रघुराज सिंह जू देव:

    रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह परम वैष्णव भक्त तथा उच्च कोटि के साहित्य सेवी थे। उनके दरवार में कवियों का विशेष मान था। वे स्वयं भी अच्छी कविता करते थे। उनकी रचनाओं का मुख्य विषय था भगवदभक्ति। कवि के रूप में उनका एक विशेष गुण था- आशु रचना अर्थात बिना पहले से तैयारी किये हुये तुरंत कविता बनाने लग जाना। एक समय की बात है जब आप रीवा के प्रसिद्ध मन्दिर लक्ष्मणबाग में निवास कर रहे थे, ए

  • जनिये आखिर कैसे मिली थी तिवारियो को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी:-

    जनिये आखिर कैसे मिली थी तिवारियो को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी:-

    बघेलखण्ड में बघेल रियासत का कीर्तिमान स्थापित करने में तिवारियों का अहम स्थान रहा है। बघेल रियासत के अभ्यूदय और विकास के साथ ही रीवा राज्य के तिवारी "अधरजिया तिवारी" कहलाने लगे थे। तिवारी से "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिलने के पीछे सौर्य एवं पराक्रम की गाथा जुडी हुई है। इसी से प्रभावित होकर बघेलों के आदिपुरूष ने तिवारियों को "अधरजिया तिवारी" की पदवी मिली थी। इसलिए यह जानना जरूरी है क

  • महाराज मार्तण्ड सिंह नें दिलाई थी दुनिया को व्हाइट टाइगर की पहचान:

    महाराज मार्तण्ड सिंह नें दिलाई थी दुनिया को व्हाइट टाइगर की पहचान:

    बघेल रियासत के 34वें महाराज के महाराज मार्तण्ड सिंह के नाम कई बडी उपलब्धियां रही। राजतंत्र लेकर प्रजातंत्र तक में मार्तण्ड सिंह नें अपनी अनूठी छाप छोडी है। महाराज मार्तण्ड नें दुनिया को जहां व्हाइट टाइगर की पहचान कराई वहीं रिमाही जनता को आजादी के पहली ही 1946 में राजतंत्र से आजाद कर दिया था। गोविन्दगढ़ किला के दरिया महल में 15 मार्च 1923 को मार्तण्ड सिंह का जन्म हुआ था। जब यह समाचार रिमह

ताज़ा खबर

Popular Lnks