एक दिन के मुख्यमंत्री, जो कभी नहीं बन सके PM

By Tejnews.com Tue, Oct 31st 2017 व्यक्ति-ब्लॉग     

मध्य प्रदेश का आज स्थापना दिवस है. एक नवंबर 1956 को एक नए राज्य के रूप में आगाज करने वाले इस प्रदेश में कई ऐसी राजनीतिक हस्तियां भी हुई हैं, जिन्होंने देश की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया. इन्हीं नेताओं में राज्य के मुख्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री तक की कुर्सी तक पहुंचने वाले अर्जुन सिंह भी शामिल थे.
भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित और विवादित शख्सियतों में अर्जुन सिंह का नाम भी शुमार हैं. राजनीति के चाणक्य के रूप में पहचाने जाने वाले अर्जुन सिंह का राजनीतिक करियर विवादों से जुड़ा रहा. दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से लेकर बाबरी मस्जिंद विंध्वस और कुख्यात डाकुओं के समर्पण से लेकर वर्ष 2004 में सोनिया गांधी की जगह मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के सियासी हलचलों को उन्होंने नजदीक से देखा था.
अर्जुन सिंह का जन्म एक राजपूत घराने में 5 नवंबर 1930 को मध्यप्रदेश के सीधी जिले के चुरहट कस्बे में हुआ था. उनके पिता राव शिव बहादुरसिंह खुद भी एक राजनीतिज्ञ थे. 1957 में अर्जुन सिंह पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए. इसके बाद वह कई बार एमपी के मुख्यमंत्री, केंद्र सरकार में कई अहम पदों और पंजाब के राज्यपाल भी रहे. मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में उनके पास मानव संसाधन जैसा अहम मंत्रालय था.
सियासी सफर शुरू करने के 23 साल बाद अर्जुन सिंह पहली बार 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने. पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया था. 1985 में हुए चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद उन्हें केवल एक दिन के मुख्यमंत्री बनाया गया था. इसके बाद उन्होंने 1988-89 मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला था.

1985 में अविभाजित मध्यप्रदेश में हुए चुनाव में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने 251 सीटों पर जीत हासिल की. ऐतिहासिक जीत के बावजूद अर्जुन सिंह केवल एक दिन के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. शपथ लेने के अगले दिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को पंजाब में शांति बहाली के लिए राज्यपाल नियुक्त कर दिया.
पंजाब में राज्यपाल के रूप में सफल पारी खेलने के बाद राजीव गांधी ने नवंबर 1985 में उन्हें अपनी सरकार में वाणिज्य मंत्री बना दिया. राजनीति के इसी दौर में कांग्रेस सांसद ललित माकन की खालिस्तानी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी. उनके निधन से खाली हुई दक्षिण दिल्ली से राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को चुनाव लड़वा दिया. अर्जुन सिंह ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. राजीव गांधी ने एक बड़े सियासी फैसले के तहत 1986 में उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष मनोनीत कर दिया. कांग्रेस के इतिहास में पहली बार किसी को उपाध्यक्ष बनाया गया था.
राजीव गांधी की हत्या के बाद पी.वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने और उनसे अर्जुन सिंह की कभी नहीं बनी. बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री के खिलाफ मुखर रूप अख्तियार कर लिया था. उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को लेकर कई सवाल भी उठाए और सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी भी लिखी थी. 1994 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया तो कुछ ही समय के भीतर उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया.
नरसिंहराव से चली राजनीति खींचतान की वजह से आखिरकार उन्हें कांग्रेस से बाहर होना पड़ा. उन्होंने एन.डी. तिवारी की अध्यक्षता में तिवारी कांग्रेस का गठन किया. ये कांग्रेस ज्यादा सफल नहीं हो सकी और उसके टिकट पर अर्जुन सिंह खुद 1996 में लोकसभा का चुनाव मध्यप्रदेश में सतना से हार गए. इसके बाद अर्जुन सिंह कांग्रेस में वापस लौट आए और 1998 का लोकसभा चुनाव उन्होंने होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से लड़ा. लेकिन इस बार भी वह हार गए. 2000 में अर्जुन सिंह राज्यसभा के लिए मध्य प्रदेश से चुने गए.
अर्जुन सिंह के दौर में चंबल के बड़े डकैतों ने सरेंडर कर दिया था. मलखान सिंह, फूलन देवी, पान सिंह और घनश्याम सिंह जैसे डकैतों के समर्पण के लिए अर्जुन सिंह ने एक नीति बनाई थी. अर्जुन सिंह की राजनीतिक और प्रशासनिक कुशलता की वजह से उस दौर में चंबल के तमाम बड़े डकैतों ने उनके सामने सरेंडर किया था.

दो और तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में भीषण गैसकांड हुआ, जिसमें हजारों लोग मारे गए. अर्जुन सिंह पर आरोप लगा था कि गैस रिसाव हुआ तो वह अपने परिवार के साथ भोपाल छोड़कर चले गए थे. यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी और फिर उनके देश से सुरक्षित निकल जाने देने पर अर्जुन सिंह की भूमिका सवालों के घेरे में रही थी.
1980 में अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अर्जुन सिंह का नाम चुरहट लॉटरी घोटाले में भी आया. यह मामला इतना विवादित हो गया कि अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. हालांकि, बाद में इस मामले में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था. तमाम राजनीतिक ऊंचाई हासिल करने और बाधाओं को पार पाने के बावजूद अर्जुन सिंह कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सके. चार मार्च 2011 को 81 वर्ष की उम्र में वे इस दुनिया से विदा हो गए थे.

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