महारानी लक्ष्मीबाई

By Tejnews.com Fri, Aug 21st 2015 व्यक्ति-ब्लॉग     

महारानी लक्ष्मीबाई एक सामान्य ब्राह्मण कुल में पैदा होकर महारानी बनीं, इसे सौभाग्य ही कहा जा सकता है, परंतु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने जिस अभूतपूर्व धैर्य, साहस और वीरता का प्रमाण प्रस्तुत कर शत्रु-सेना के दांत खट्टे कर दिये, यह उनकी निजी सूझ-बूझ और वीरोचित प्रतिभा ही थी।भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में हमारे ही कुछ भाई गद्दारी कर गए, अन्यथा रानी झांसी के साहसपूर्ण पराक्रम से अंग्रेज उसी समय भारत छोड़ भागते
वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई भारतीय इतिहास की एक गौरव विभूति; रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को काशी के असीघाट, वाराणसी में हुआ था. इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाई था. इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था.
मनु जब मात्र चार साल की थीं, तब उनकी मां का निधन हो गया. पत्नी के निधन के बाद मोरोपंत मनु को लेकर झांसी चले गए. रानी लक्ष्मी बाई का बचपन उनके नाना के घर में बीता, जहां वह छबीली कहकर पुकारी जाती थी. जब उनकी उम्र 12 साल की थी, तभी उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ कर दी गई.
सहजभाव से दिया गया यह आशीर्वाद कालान्तर में सत्य सिद्ध हुआ। कहा जाता है इस कन्या के जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्वाणी की थी कि यह कन्या राज्यलक्ष्मी युक्त तथा अनुपम शौर्यशालिनी होगी। उस समय नवजात अबोध बालिका के शान्त, सौम्य एवं निश्छल मुख को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह बालिका अपने स्वाधीनता-प्रेम तथा राज्य की रक्षा के लिए इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय की सर्जना करेगी। माता-पिता ने इस कन्या का नाम मनूबाई रखा तथा प्रेम से उसका-पोषण करने लगे।
उसका जीवन आरोह-अवरोह का एक विचित्र समन्वय रहा है। एक सामान्य स्तर के व्यक्ति मोरोपन्त ताम्बे की सात वर्षीया अबोध पुत्री परिस्थितियों वश झांसी के प्रौढ़प्राय राजा गंगाधर राव की महारानी लक्ष्मीबाई बन गयी। अपने जीवन के उन्नीसवें वर्ष में ही वह विधवा हो गयीं। यहीं से उनका संघर्षमय जीवन आरम्भ हो गया। झांसी के अंग्रेजी राज्य में विलय के समय वह गरज उठीं -मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।
प्रायः बाईस वर्ष की अवस्था में; वह भी आज से लगभग सवा सौ वर्ष पहले, भारत के पुरुष प्रधान समाज में प्रबल पराक्रमी सर्वसाधन सम्पन्न अंग्रेजों के विरूद्ध उनका एक संघर्ष निश्चय ही एक क्रान्तिकारी कार्य था। उनमें एक श्रेष्ठ वीरांगना और योग्य सेनानायक के सभी गुण विद्यमान थे। इसे उनके शत्रु अंग्रेजों ने भी निःसंकोच स्वीकार किया, किन्तु इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा कि संघर्ष के उनके सहयोगियों ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जिसकी वह अधिकारिणी थीं। झांसी के संघर्ष की असफलता के बाद वह कालपी पहुंचीं, जहां से पेशवा साहब राव, वीर तात्या टोपे और बांदा के नवाब संघर्ष में उनके सहयोगी बने। महारानी लक्ष्मीबाई अपने इन सभी सहयोगियों से योग्य सेनानायिका थीं।

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