रजिया सुल्ताना

By Tejnews.com 2015-08-21 व्यक्ति-ब्लॉग     

रजिया सुल्ताना एक महान सम्राज्ञी, बुद्धिमान, न्यायप्रिय, उदार, राज्य की भलाई चाहने वाली, सबको समान दृष्टि से देखने वाली तथा अपनी सेना की अगुवा थी। मुलसलमानो मे यह पहली मलिका है जो दिल्ली के सिहंासन पर बैठी। यह राजमुकुट पहिन कर बिना बुरके के दरबार मे आती थी मुकदमे सुनती, फैसले करती। न्याय और ईमानदारी मे प्रसिद्ध हो गई। हांथ मे तलवार और घोडे की सवारी करती, युद्धो में पुरूषो से कंधा मिलकर चलती, बादशाही सिक्के पर अपने नाम के पहले सुलतान लिखवाती। इसमे ऐसी कोई बात नही थी जो कि पुरूषो की समानता ना करती हो। दरबारी लोग भी रजिया की बुद्धिमानी राजनीति और कार्य कुशलता का लोहा मानते थे। अल्तमश के बीस पुत्र थे इसके अलावा रजिया अकेली पुत्री थी। छोटी ही उम्र में रजिया मे तलवार चलाना, घोडे की सवारी करना, यु़द्ध के नियम अपने भाईयो को देखकर सीख लिया था। सन् १२६३ में अल्तमश की मृत्यु के बादए उसके पुत्रों की कम.जोरी एवं नैतिक पतन के कारण उसके राज्य की हालत बहुत बुरी थी। उसका प्रथम पुत्र रुकनुद्दीन फिरोजशाह एक खूबसूरतए उदार तथा कोमलहृदय जवान आदमी थाय किन्तु वह कमजोर व्यक्तित्व वाला तथा मूर्ख भी था। पिता के बाद वह राजा बना किन्तु अपनी स्वयं की शक्ति एवं बुद्धि के अभाव में वह अपनी मांए जो तुर्की गुलाम थीए के हाथ का खिलौना बन गया। वास्तव में शासन वह करती और रुकनुद्दीन खाताए पीता और मौज उडाता। वह गाने और नाचने वाली औरतोंपर धन और आभूषण लुटाया करता।
वह मसखरों को भी पैसे लुटाता तथा शराब में मदहोश होए हाथी पर बैठ झूमता हुआ धुमने जाता। रास्ते में इकट्ठी होनेवाली भीड में अपने प्रशंसकों को वह सोना दिया करता। वह कामुकताए मूर्खता तथा नीचों की संगति का शिकार था। असकी मां भी बडी दुष्ट एवं कठोर थी। इन्हीं सब कारणों से राज्य में विद्रोह हुआ और रुकनुद्दीन फिरोजशाह सात माह के अल्पकाल के बाद ही गद्दी से उतार दिया गया। उसकी मां समेत उसे कैद कर लिया गया तथा मार डाला गया। अब प्रश्न उटा.शासक कौन हो घ् चूंकि अल्तमश का कोई भी पुत्र शासक बनने योग्य नहीं थाए सबकी आंखें रजया की ओर गईंए जो दिल और दिमाग से अपने पिता के ही अनुरूप थी। रजया का सौन्दर्य भी अनुपम एवं अद्वितीय था। वह बुद्विमान तथा विद्वान थी। उसके पिता ने उसे शिक्षा दी और वह स्वयं कुरान पढ लेती थी। उसके पिता ने उसे राजनीति का भी ज्ञान दे दिया था। वास्तव में अल्तमश को अपनी इस प्रतिभावान लडकी पर बडा गर्व था और वे उसकी योग्यता पर बडा विश्वास रखते थे।
एक बार सन् १२२६ में जब अल्तमश दक्षिण में युद्ध के लिए गया था तो वह शासन का कार्य रजया को सैंप गया था। उसने अपने दरबार के लोगों को संबोधित करते हुए कहा थाए ष्ष्शासन का यह भार मेरे लडकों की शक्ति के बाहर है यद्यपि वे संख्या में बीस हैंए किन्तु नाजुक रजया के लिए यह कुछ भी नहीं है। उसमें उन सबसे ज्यादा शक्ति एवं उत्साह है।ष्ष् रजया ने पिता के द्वारा सौंपे गए शासन.कार्य को बडी चतुराई एवं बुद्विमत्ता से चलाया। वास्तव में यह उसकी योग्यता की परीक्षा ही थी। कारणए उसके मार्ग में बाधाएं डालने वाले उसके उद्दण्ड भाई तथा दुष्ट एवं विवेक.हीन मां थी। सिवाय इसके राज्य में दो गुट थेए जिनके द्वारा कभी भी खुलेआम उपद्रव की अग्नि भडक सकती थी। इन सारी कठि.नाइयों के बावजूद भीए रजया ने शासन इतनी दृढता एवं बुद्धि.मानी से चलाया कि उसके भाइयों ने भी उसकी प्रशंसा की। अल्तमश लौटने पर अपनी चतुर लडकी के काम को देखए बडा प्रसन्न हुआ और रजिया को सिंहासन पर बैठा दिया।
रजया के सिंहासन पर बैठने से सभी को बडी प्रसन्नता हुई। केवल कुछ पुराने विचारों के लोग थेए जो नहीं चाहते थे कि एक औरत के आगे वे अपना सिर झुकाएं। उसने ऐसी योग्यता और निपुणता से शासन. कार्य चलाया कि शीघ्र ही विरोधियों और गुट.बंदी करने वालों को अपने वश में कर लिया। रजया राज्य के महत्त्वपूर्ण कार्यों में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेती तथा प्रत्येक दिन सिंहासन पर बैठी हुई दिखाई देती तथा अपनी सूझबूझ एवं शीघ्र निर्णय करने की शक्ति के द्वारा जनता के कष्टों को दूर करए उन्हें राहत देती। प्रजा का रजया में अगाध विश्वास था तथा वह उसके राज्य में सुरक्षितता का अनुभव करती थी।
अलतूनिया नेए जो भटिंडा का गवर्नर थाए सबसे पहले रजया के खिलाफ बगावत की। जब रजया को इसका पता चला तो उसने उससे तुरन्त मिलने का निर्णय किया उसे पूरा विश्वास था कि वह अलतूनिया को समझाने में सफल हो जाएगी। क्षण.भर के लिए वह पुरानी बातों में खो गई। उस समय अलतूनिया दिल्ली में था। उसकी योग्यताए बुद्धिमत्ताए महत्त्वाकांक्षा तथा कठिन से कठिन समस्या को सुलझा लेने की शक्ति.और इन सबसे ज्यादा रजया के लिए उसके ह्वदय में गहरा प्रेम.सारी बातें रजया के सामने उभर आई। अलतूनिया और रजया ! दोनों का जोडा कितना अच्छा होगा.कई बार रजिया ने सोचा था और दरबार के लोग भी सोचने लगे थे कि वे दोनों शीघ्र विवाह.बंधन में बंध जाएंगे। इससे लोगों में इतना विरोध न होता और न ही इतनी समस्याएं उठ खडी होतीं जितनी कि आज उठी हैं। उस समय मामले को सुलझाना ज्यादा आसान होता। घडी.भर के लिए रजिया के सामने अलतूनिया और याकूत दोनों आ गए और वह विचित्र अन्तर्द्वन्द्व में डूब गई.अलतूनिया बहादुरए सज्जनए योग्य एवं सूझबूझ वाला है। वह मेरे मस्तिष्क को प्रभावित करता है और मेरे मन में उसके प्रति श्रद्धा और ही है! वह एक खूबसूरतए खुशमिजाज आकर्षक जवान है। उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी विशेषता है कि उसे देखते ही मेरा रोम.रोम उठ खडा होता है। वह मेरे ह्वदय को प्रभावित करता हैए इतना ही नहींए मदहोश कर देता है ! मैं याकूत के साथ परिंदे की तरह आजाद अनुभव करती हूंए लेकिन अलतूनिया ! उसके साथ सारे सम्बन्धों के बावजूद भी एक दूरीए एक बन्धन और रुकावट का आभास होता हैए जो जायज भले ही हो लेकिन दिल उसे नहीं चाहता। यदि दिमाग से काम लिया जाए तो अलतूनिया को पहला स्थान मिलता हैए लेकिन दिल से पूछा जाए तो याकूत की बराबरी कोई नहीं कर सकता ।
अलतूनिया ने पहले रजिया को कैद करके रखाए लेकिन बाद में उसकी खूबसूरती और आकर्षक व्यवहार से प्रभावित होकर उससे विवाह कर लिया। किन्तु यही पर्याप्त न था । भाग्य ने कुछ और ही तय किया था। पदच्युत रजिया पर दुर्भाग्य की काली घटा छा रही थी। अलनूनिया की महत्त्वाकांक्षा जागी और वह एक बडी सेना ले रजिया सहित दिल्ली की ओर बढाए ताकि खोया हुआ राज्य प्राप्त किया जा सके।
भाग्य उनके विपरीत था। दो बार उनकी सेना को मात खाकर पीछे हटना पडा। तीसरी बार गुलाम राजा की सेना ने ऐसी करारी मात दी कि अलतूनिया की सारी सेना बिखर गई और रजिया और अलतुनिया कैद कर लिए गए। और फिर न तो उसकी खूबसूरती और गुणए और न ही प्रजा के प्रति किए गए उसके भलाई के कार्य उसके भयानक अंत को रोक सके । रजिया और अलतूनिया की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी गईए और इस तरह भारत में गुलाम वंश के शासन का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया।

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