नूरजहाँ

By Tejnews.com 2015-08-21 व्यक्ति-ब्लॉग     

सम्राट जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ का मूल नाम 'मेहरुन्निसा' था। जब उसका पिता मिर्ज़ा गियासबेग़, जो कि फ़ारस का निवासी था, अपने भाग्य की परीक्षा करने भारत आ रहा था, तभी मार्ग में नूरजहाँ का जन्म कंधार में हुआ था। उसका पिता ग़ियासबेग अकबर के दरबार में एक उच्च पद पाने में सफल हुआ और 1605 ई. में जहाँगीर के राज्यारोहण के वर्ष ही वह मालमंत्री नियुक्त हो गया। उसे एत्मादुद्दोला की उपाधि दी गई। नूरजहाँ असाधारण बुद्धिमती थी, जहाँगीर ने शासन का समस्त भार उसी पर छोड़ रखा था। सत्रह वर्ष की अवस्था में मेहरुन्निसा का विवाह 'अलीकुली' नामक एक साहसी ईरानी नवयुवक से हुआ, जिसे जहाँगीर के राज्यकाल के प्रारम्भ में शेर अफ़ग़ान की उपाधि और बर्दवान की जागीर दी गई थी। 1607 ई. में जहाँगीर के दूतों ने शेर अफ़ग़ान को एक युद्ध में मार डाला और मेहरुन्निसा को दिल्ली के शाही हरम में लाया गया। यहाँ वह सम्राट अकबर की विधवा रानी 'सलीमा बेगम' की परिचारिका बनी। मेहरुन्निसा को जहाँगीर ने सर्वप्रथम नौरोज त्यौहार' के अवसर पर देखा और उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो जहाँगीर ने मई, 1611 ई. में उससे विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात् जहाँगीर ने उसे नूरमहल एवं नूरजहाँ की उपाधि प्रदान की। 1613 ई. में नूरजहाँ को पट्टमहिषी या बादशाह बेगम बनाया गया। विवाह के बाद नूरजहाँ ने नूरजहाँ गुट का निर्माण करवाया। असाधारण सुन्दरी होने के अतिरिक्त नूरजहाँ बुद्धिमती, शील और विवेकसम्पन्न भी थी। उसकी साहित्य, कविता और ललित कलाओं में विशेष रुचि थी। उसका लक्ष्य भेद अचूक होता था। 1619 ई. में उसने एक ही गोली से शेर को मार गिराया था। इन समस्त गुणों के कारण उसने अपने पति पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। इसके फलस्वरूप जहाँगीर के शासन का समस्त भार उसी पर आ पड़ा था। सिक्कों पर भी उसका नाम खोदा जाने लगा और वह महल में ही दरबार करने लगी। उसके पिता एत्मादुद्दोला और भाई आसफ़ ख़ाँ को मुग़ल दरबार में उच्च पद प्रदान किया गया था और उसकी भतीजी का विवाह, जो आगे चलकर मुमताज़ के नाम से प्रसिद्ध हुई, शाहजहाँ से हो गया। उसने पहले पति से उत्पन्न अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे पुत्र शहयार से कर दिया और क्योंकि उसकी जहाँगीर से कोई संतान नहीं थी, अत: वह शहरयार को ही जहाँगीर के उपरांत राज सिंहासन पर बैठाना चाहती थी। नूरजहाँ के ये सभी कार्य उसकी कूटनीति का ही एक हिस्सा थे। 1620 ई. के अन्त तक नूरजहाँ के सम्बन्ध ख़ुर्रम (शाहजहाँ) से अच्छे नहीं रहे, क्योंकि नूरजहाँ को अब तक यह अहसास हो गया था कि, शाहजहाँ के बादशह बनने पर उसका प्रभाव शासन के कार्यों पर कम हो जायगा। इसलिए नूरजहाँ ने जहाँगीर के दूसरे पुत्र शहरयार को महत्व देना प्रारम्भ कर किया। चूंकि शहरयार अल्पायु एवं दुर्बल चरित्र का था, इसलिए उसके सम्राट बनने पर नूरजहाँ का प्रभाव पहले की तरह शासन के कार्यों में बना रहता। इस कारण से शेर अफ़ग़ान से उत्पन्न अपनी पुत्री 'लाडली बेगम' की शादी 1620 ई. में शहरयार से कर उसे 8000/4000 का मनसब प्रदान किया। जहाँगीर के जीवन काल में नूरजहाँ सर्वशक्ति सम्पन्न रही, किंतु 1627 ई. में जहाँगीर की मृत्यु के उपरांत उसकी राजनीतिक प्रभुता नष्ट हो गई। नूरजहाँ की मृत्यु 1645 ई. में हुई। अपनी मृत्यु पर्यन्त तक का शेष जीवन उसने लाहौर में बिताया।

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