इंदिरा एकादशी: इस विधि से से करेंगे पूजा, तो पूर्वजों को मिलेगा मोक्ष

By Tejnews.com Sun, Sep 17th 2017 धर्म-कर्म     

हिंदू पचांग के अनुसार अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की एकदाशी पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए उत्तम मानी जाती है। इसे इंदिरा एकादशी के नाम से भी जानते है। इस दिन शालिग्राम की पूजा करने का विधान है। इस बार एकादशी 16 सितंबर, शनिवार को है।

हिंदू शास्त्रों में माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से इंसान को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होगी। जानिए इसकी पूजा विधि और कथा के बारें में।

पूजा विधि
पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रतों के नियमों का पालन दशमी तिथि से किया जाता है, जिसमें एक बार भोजन, ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। अगले दिन यानि एकादशी व्रत के दिन स्नानादि से पवित्र होकर व्रत संकल्प लेना चाहिए।

पितरों का आशीष लेने के लिए विधि-पूर्वक श्राद्ध कर ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा देना चाहिए। पितरों को दिया गया अन्न- पिंड गाय को खिलाना चाहिए। फिर धूप, फूल, मिठाई, फल आदि से भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान है।

उसके बाद अगले दिन यानि द्वादशी तिथि को सवेरा होने पर पुन: पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन करवाकर, परिवार के साथ मौन होकर भोजन करना चाहिए।

ये है कथा
सतयुग के समय महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए रहता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और भगवान विष्णु का परम भक्त था।

एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और उनका पूजन किया। उन्होंने देवर्षि नारद से उनके आने का कारण पूछा। तब नारद मुनि ने कहा कि- हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो। मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहां श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया वह मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं।

इसलिए हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। नारदजी की बात सुनकर राजा ने अपने बांधवों तथा दासों सहित व्रत किया, जिसके पुण्य प्रभाव से राजा के पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गए। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गए।

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