विंध्य में कुप्रबंधन बना बाघों का 'काल'

By Tejnews.com 2017-07-29 रीवा रीजन     

सतना। बाघों के रहवास के लिए विंध्य के जंगल अनुकूल हैं। पन्ना, सतना, रीवा, सीधी व सिंगरौली के जंगल की सघनता व वाइल्ड लाइफ परिस्थितियां उचित हैं। पर्याप्त भोजन उपलब्ध है। नेचुरल कॉरिडोर है, जिससे बाघों का सामान्य आना-जाना होता है। इसके बावजूद विंध्य के जंगल बाघों के लिए काल बने हुए हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण कुप्रबंधन है।

टाइगर रिजर्व से लेकर चिडिय़ाघर में लापरवाही देखने को साफ मिलती है। इसके दो उदाहरण मात्र 6 माह के अंदर ही देखने को मिले। एक जनवरी-जुलाई 2017 तक संजय गांधी टाइगर रिजर्व में दो बाघों की मौत हो चुकी है। सरभंगा में बाघिन की लोकेशन लेने वाला रिसीवर 20 दिन तक खराब रहा। किसी ने गंभीरता नहीं बरती। मुकुंदपुर में एक के बाद कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। मात्र डेढ़ साल के दौरान पन्ना, सतना व सीधी में 9 बाघों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। लापरवाही का आलम यह है कि बाघ की लोकेशन व रहवास क्षेत्र में आमव्यक्ति के दखल की सूचना पर भी जिम्मेदार चुुप्पी साध लेते हैं।

सरकारी नीतियां भी भारी : बाघों को लेकर शासन की नीतियां भी भारी पड़ रही हैं। केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पूरा होने से बाघों का रहवास खत्म हो जाएगा। अगर, बाघ सतना जिले की ओर आते हैं तो यहां एक के बाद एक सीमेंट कंपनियां खड़ी होती जा रही हैं। जो बाघों के रहवास में समस्या हैं। इसका उदाहरण पी 212 पर हुआ शोध है। दो साल पहले पी-212 पन्ना टाइगर रिजर्व से निकला था। सतना जिले में वह करीब एक माह रहा। मैहर क्षेत्र में 10-12 दिन भटकने के बाद वह संजय गांधी टाइगर रिजर्व पहुंच गया। वहां दूसरे बाघ के हमले में मारा गया। इस दौरान यह तथ्य सामने आए थे कि पी-212 का मूवमेंट बांधवगढ़ के पास था, लेकिन रात के वक्त मैहर स्थित सीमेंट फैक्ट्रियों की लाइटें जलतीं, तो उसे लगता कि जंगल में आग लगी और बाद में वह सीधी की ओर रुख कर गया। वहीं सतना, रीवा, सीधी व सिंगरौली में पत्थर की खदानें भी बाघों के रहवास को चुनौती दे रही हैं।

प्रदेशभर में स्थिति खराब
प्रदेश में वर्ष 2012 से वर्ष 2015 तक औसतन लगभग 14 बाघों की मौत हर साल हुई। वर्ष 2016 में 33 बाघों की मौत हुई। जो पिछले चार वर्षों की बाघों की औसतन मौत से तुलना करने पर दोगुनी से भी ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार, जिन 89 बाघों की पिछले पांच वर्षों में मौत हुई उनमें से 30 बाघ आपसी संघर्ष में मारे गए। इसमें सतना, पन्ना व सीधी में 6 बाघ शामिल हैं। 22 बाघों को शिकारियों ने शिकार, जहर या विद्युत करंट से मारा। बाकी बाघ बीमारी, वृद्धावस्था या अन्य कारणों से मरे। सतना में एक बाघ ट्रेन से टकरा कर मरा।

शुरू से लापरवाही
सतना वन परिक्षेत्र में दो बार बाघ होने के स्थाई तथ्य मिले। लेकिन, दोनों बार दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही। 10 साल पहले उचेहरा के जंगल में बाघ घायल अवस्था में मिला था, जिसे गोली लगी थी। उपचार के दौरान भोपाल में मौत हो गई। मामले में खानापूर्ति कर दी गई। रसूखदारों के गिरेबां तक वन विभाग के हाथ नहीं पहुंच सके। शुरुआती दौर से ही बाघों की सुरक्षा को लेकर लापरवाही देखने को मिली। अगर, सूचना मिलती भी है तो बाघ व इंशान को दूर करने के प्रयास नहीं होते हैं। कई बार देखने को मिलता है कि सुरक्षा में लापरवाही बरती जाती है।

पन्ना के बाघों की तीसरी पीढ़ी से उम्मीद
सतना जिले के सरभंगा में पन्ना के बाघों की तीसरी पीढ़ी ने जन्म लिया है। माना जा रहा है कि इससे सतना के जंगलों में बाघों को स्थाई पहचान मिलेगी। साथ ही रीवा के जंगल भी इससे आबाद हो सकते हैं। तीसरी पीढ़ी से उम्मीद है कि सतना व रीवा के जंगल में बाघों का कुनबा फैलेगा।

टेरीटरी छोड़ते ही मारे गए बाघ
विंध्य में बाघों को लेकर अनुभव काफी कड़वा रहा है। अक्सर देखने को मिला है कि बाघ ने पुरानी टेरीटरी छोड़ी और कुछ दिन में मौत की सूचना आ गई। दो साल पहले बाघ-पी 212 पन्ना टाइगर रिजर्व से बाहर निकाला था, जो सतना-रीवा होते हुए संजय गांधी टाइगर रिजर्व पहुंचा। उसने वहीं टेरीटरी बना ली। कुछ समय बाद दूसरे बाघ के साथ लड़ाई में मारा गया।

केस- 1

पेंच टाइगर रिजर्व सिवनी से विगत 21 मार्च को संजय टाइगर रिजर्व सीधी लाए गए बाघ टी-22 की लगभग 20 दिन बाद मौत हो गई। संजय टाइगर रिजर्व के प्रबंधन ने बताया कि बाघ कुछ दिनों से सुस्त था। उसने शिकार भी नहीं किया था। हालांकि उसके इलाज के लिए जबलपुर से डॉक्टरों की टीम बुलाई गई थी। लेकिन, डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए।

केस- 2

दिसंबर 2016 में मझगवां वन क्षेत्र के चितहरा के पास चार वर्षीय नर बाघ की मौत ट्रेन दुर्घटना में हो गई। 170 सेमी लंबे और 3 फिट ऊंचे बाघ की मौत ने जिलेभर के लोगों को हिलाकर रख दिया। मौका मुआयना करने के बाद बाघ के शव को सतना वन मंडल लाया गया। पोस्टमार्टम के बाद सौनोरा में अंतिम संस्कार किया गया।

केस- 3

सतना के मुकुंदपुर स्थित दुनिया की पहली ओपेन व्हाइट टाइगर सफारी में डेढ़ साल पहले भिलाई से सफेद बाघिन राधा को लाया गया था। सहवास के दौरान सफेद बाघ नकुल ने उस पर हमला बोल दिया था। इससे राधा घायल हो गई। बाद में 6 दिसंबर 2016 को उसकी मौत हो गई।

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